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शनिवार, 30 मई 2020

हर कार्य की सिद्धि होती है कामिका एकादशी कथा और महत्व

ॐ गं गणपतये नमः 

जय श्रीकृष्ण मित्रों ! आज कामिका एकादशी है जानते है इस का महत्व 

कामिका एकादशी


युधिष्ठिर ने पूछा : गोविन्द ! वासुदेव ! आपको मेरा नमस्कार है ! श्रावण (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार आषाढ़) के कृष्णपक्ष में कौन सी एकादशी होती है कृपया उसका वर्णन कीजिये ।

भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! सुनो । मैं तुम्हें एक पापनाशक उपाख्यान सुनाता हूँजिसे पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने नारदजी के पूछने पर कहा था ।

नारदजी ने प्रशन किया : हे भगवन् ! हे कमलासन ! मैं आपसे यह सुनना चाहता हूँ कि श्रवण के कृष्णपक्ष में जो एकादशी होती हैउसका क्या नाम हैउसके देवता कौन हैं तथा उससे कौन सा पुण्य होता हैप्रभो ! यह सब बताइये ।

ब्रह्माजी ने कहा : नारद ! सुनो । मैं सम्पूर्ण लोकों के हित की इच्छा से तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दे रहा हूँ । श्रावण मास में जो कृष्णपक्ष की एकादशी होती हैउसका नाम कामिका’ है । उसके स्मरणमात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है । उस दिन श्रीधरहरिविष्णुमाधव और मधुसूदन आदि नामों से भगवान का पूजन करना चाहिए ।

भगवान श्रीकृष्ण के पूजन से जो फल मिलता हैवह गंगाकाशीनैमिषारण्य तथा पुष्कर क्षेत्र में भी सुलभ नहीं है । सिंह राशि के बृहस्पति होने पर तथा व्यतीपात और दण्डयोग में गोदावरी स्नान से जिस फल की प्राप्ति होती हैवही फल भगवान श्रीकृष्ण के पूजन से भी मिलता है ।

जो समुद्र और वनसहित समूची पृथ्वी का दान करता है तथा जो कामिका एकादशी’ का व्रत करता हैवे दोनों समान फल के भागी माने गये हैं ।

जो ब्यायी हुई गाय को अन्यान्य सामग्रियोंसहित दान करता हैउस मनुष्य को जिस फल की प्राप्ति होती हैवही कामिका एकादशी’ का व्रत करनेवाले को मिलता है । जो नरश्रेष्ठ श्रावण मास में भगवान श्रीधर का पूजन करता हैउसके द्वारा गन्धर्वों और नागोंसहित सम्पूर्ण देवताओं की पूजा हो जाती है ।

अत: पापभीरु मनुष्यों को यथाशक्ति पूरा प्रयत्न करके कामिका एकादशी’ के दिन श्रीहरि का पूजन करना चाहिए । जो पापरुपी पंक से भरे हुए संसारसमुद्र में डूब रहे हैंउनका उद्धार करने के लिए कामिका एकादशी’ का व्रत सबसे उत्तम है । अध्यात्म विधापरायण पुरुषों को जिस फल की प्राप्ति होती हैउससे बहुत अधिक फल कामिका एकादशी’ व्रत का सेवन करनेवालों को मिलता है ।
कामिका एकादशी’ का व्रत करनेवाला मनुष्य रात्रि में जागरण करके न तो कभी भयंकर यमदूत का दर्शन करता है और न कभी दुर्गति में ही पड़ता है ।

लालमणिमोतीवैदूर्य और मूँगे आदि से पूजित होकर भी भगवान विष्णु वैसे संतुष्ट नहीं होतेजैसे तुलसीदल से पूजित होने पर होते हैं । जिसने तुलसी की मंजरियों से श्रीकेशव का पूजन कर लिया हैउसके जन्मभर का पाप निश्चय ही नष्ट हो जाता है ।

या दृष्टा निखिलाघसंघशमनी स्पृष्टा वपुष्पावनी
रोगाणामभिवन्दिता निरसनी सिक्तान्तकत्रासिनी ।
प्रत्यासत्तिविधायिनी भगवत: कृष्णस्य संरोपिता
न्यस्ता तच्चरणे विमुक्तिफलदा तस्यै तुलस्यै नम: ॥

जो दर्शन करने पर सारे पापसमुदाय का नाश कर देती हैस्पर्श करने पर शरीर को पवित्र बनाती हैप्रणाम करने पर रोगों का निवारण करती हैजल से सींचने पर यमराज को भी भय पहुँचाती हैआरोपित करने पर भगवान श्रीकृष्ण के समीप ले जाती है और भगवान के चरणों मे चढ़ाने पर मोक्षरुपी फल प्रदान करती हैउस तुलसी देवी को नमस्कार है ।

जो मनुष्य एकादशी को दिन रात दीपदान करता हैउसके पुण्य की संख्या चित्रगुप्त भी नहीं जानते । एकादशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण के सम्मुख जिसका दीपक जलता हैउसके पितर स्वर्गलोक में स्थित होकर अमृतपान से तृप्त होते हैं । घी या तिल के तेल से भगवान के सामने दीपक जलाकर मनुष्य देह त्याग के पश्चात् करोड़ो दीपकों से पूजित हो स्वर्गलोक में जाता है ।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : युधिष्ठिर ! यह तुम्हारे सामने मैंने कामिका एकादशी’ की महिमा का वर्णन किया है । कामिका’ सब पातकों को हरनेवाली हैअत: मानवों को इसका व्रत अवश्य करना चाहिए । यह स्वर्गलोक तथा महान पुण्यफल प्रदान करनेवाली है । जो मनुष्य श्रद्धा के साथ इसका माहात्म्य श्रवण करता हैवह सब पापों से मुक्त हो श्रीविष्णुलोक में जाता है


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बुधवार, 15 मार्च 2017

प्रथम अध्याय : "अर्जुनविषादयोग" (श्लोक संख्या - 11-20)

ॐ श्रीपरमात्मने नमः। 
 "अर्जुनविषादयोग"
प्रथम अध्याय 

 जय श्री कृष्ण ! मेरे कृष्ण प्रेमी मित्रों ! अब तक आप ने पढ़ा।  पहले अध्याय के श्लोको  में : धृतराष्ट्र बोले : हे संजय ! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?(१-श्लोक)संजय बोले: उस समय राजा दुर्याधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवो की सेना को देखकर और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा।(२-श्लोक)हे आचार्य ! आप के बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्र द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रों की इस बड़ी भारी सेना को देखिये। (३-श्लोक) इस सेना में बड़े-बड़े धनुषयवाले तथा युद्ध में भीम और अर्जुन के समान शूरवीर सात्यकि और विराट तथा महारथी राजा द्रुपद, धृष्टकेतु और चेकितान तथा बलवान काशिराज, पुरुजित, कुन्तिमोज और मनष्यों में श्रेष्ट शैब्य, पराक्रमी युधामन्यु तथा बलवान उत्तमौजा, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु एवं द्रौपदी के पाँचो पुत्र ये सभी महारथी है।(४,५ ,६-श्लोक) हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! अपने पक्ष में भी जो प्रधान है, उनको आप समझ लीजिये।  आपकी जानकारी के लिए मेरी सेना के जो - जो सेनापति है, उनको बतलाता हूँ। (७ श्लोक) आप, द्रोणाचार्य और पितामह भीष्म तथा कर्ण और सग्रामविजयी कृपाचार्य तथा वैसे ही अश्वत्थामा, विकर्ण और सोमदत का पुत्र भुरिश्रवा। (८- श्लोक)और भी मेरे लिए जीवन की आशा त्याग देनेवाले बहुत-से शूरवीर अनेक प्रकार के अस्त्रो - शास्त्रो से सुसज्जित और सब के सब युद्ध में चतुर है। (९ -श्लोक)भीष्म पितामह द्वारा रक्षित हमारी वह सेना जीतने में सुगम है।  (१०-श्लोक) 

संजय उवाच - 

जवानों कतारो में बंट जाइयो, 
परे बांध कर रण में डट जइयो। 
दिलेरों ! सफ़े अपनी भर दो सभी,
न भीष्म पे आंच आये मर्दो कभी।११। 
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यह सुन कर गरजने लगा मिस्ल-ए शेर,
वो भीष्मपितामह वो पीर - ए दिलेर। 
वो शंख अपना जंगी बजाने लगा,
तेरे लाल का दिल बढ़ाने लगा। १२। 
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यकायक उठा फ़ौज से शोर - ओ गुल, 
जो नाकूस चिल्लाये खड़के दुहुल।
गरजने धड़कने लगे ढोल दफ़,
लगी गोमुखे चीखने हर तरफ। (१३)
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खड़ा था वहां एक रथ शानदार,
जुते जिस में बुर्राक सब रहोवार।
थे माधो भी अर्जुन भी उस में खड़े,
वो शंख आसमानी बजाने लगे। (१४)
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ह्रषीकेश का पंचजन्य पे जोर,
इधर देवदत्त पर था अर्जुन का शोर। 
उधर भीम - सा मर्द-ए खूंखार था,
जो पौड्र पे चिघाडता था खड़ा। १५ । 
*********************
महीपत युधिष्ठर वो कुंती का लाल,
'विजय' पर देखता था अपना कमाल।
देखते नकुल और सहदेव जोश,
लिये एक 'मणिपुष्पक' और इक सुघोष।१६।
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वो काशी का राजा धुनुषधार भी,
शिखण्डी महारथ सा जररार भी,
विराट और बली​ द्रेष्ट्रधुमन सभी,
कवि सत्यकि जो न हारा कभी। १७। 
*********************
द्रुपद और सुभद्रा का बलवंत लाल,
पिसर द्रोपदी दी सभी बाकमाल। 
महाराज हर - सू देखते थे जोश,
बजाते थे शंख अपने बासद ख़रोश।१८।
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वो हंगामा बरपा हुआ आलमाँ,
हुए शोर से पुरजमी आसमाँ।
हिरासाँ थे धृतराष्ट्र के पिसर,
लगे फटने सीनों में कल्ब - ओ जिगर। १९। 
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कि इतने में पाण्डु का बेटा उठा,
उड़ाता फरेरा हनुमान का। 
कमाँ उस ने ले ली कि तेरे पिसर,
खड़े थे चलाने को तीर - ओ तबर। २०। 
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 जय श्री कृष्ण !

प्यारे मित्रों ! ये ब्लॉग कैसा लगा आप को कमेंट करना न भूले।   कल मुलाकात होगी। आप के ह्रदय में कृष्ण भक्ति बनी रहे इसी के साथ आप सब को जय श्री कृष्ण आप का दिन मंगलमय हो। 
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सोमवार, 13 मार्च 2017

सदगुरुदेव "स्वामी श्रीगीतानंद जी महाराज": उर्दू के प्रसिद्ध शायर ख्वाजा दिल मोहम्मद जी ने भी सरल उर्दू पद में श्री गीता जी का श्लोकशः अनुवाद

उर्दू के प्रसिद्ध शायर ख्वाजा दिल मोहम्मद जी ने भी सरल उर्दू पद में श्री गीता जी का श्लोकशः अनुवाद किया है।  वंदनीय सदगुरुदेव "स्वामी श्रीगीतानंद जी महाराज" के दिशा निर्देशन में बड़ी श्रद्धा और लग्नता पूर्वक श्रीगीता जी के अध्यन - अध्यापन व प्रचार - प्रसार का कार्य सुचारू रूप से हो रहा है।  गुरूजी के आशीर्वाद से ये छोटा सा प्रयास है हमारी तरफ से गीता जी का उर्दू पद्यानुवाद पर प्रकाश डालने की कोशिश की गई है। आशा है कि ये गीता प्रेमियो में दिव्य रस का संचार करता हुआ उन्हें आध्यात्मिक मंज़िलो तक ले जाएगा।  
ॐ श्रीपरमात्मने नमः। 
 "अर्जुनविषादयोग"
प्रथम अध्याय 

धृतराष्ट्र उवाच -

कुरुक्षेत्र की धर्मभूमि पे जब, मिले पडुवो से मेरे लाल सब।  
लड़ाई का दिल में जमाये ख्याल, तो संजय बता उन का सब हालचाल?। १।


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संजय उवाच - 

महाराज ! आई नज़र जिस घडी, सफ़ - ए आरासपह पाण्डवो कि खड़ी।  
गये राजा दुर्योधन उठ कर शिताब, किया जा के अपने गुरु से खिताब। २। 




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