सोमवार, 24 अगस्त 2020

श्री राधाकृष्ण की सुंदर लीला जिसे सुनकर आप का हृदय भी तड़प उठेंगे

 राधे राधे भक्त प्रेमियों मेरा चैनल सब्सक्राइब करें कथा पसंद आए तो लाइक और शेयर और कमेंट अवश्य करें आज का मेरा विषय राधेकृष्ण की एक अत्यंत रसीली मनमोहक और आनंदित कथा लेकर आई हूं जो आपके हृदय से हां कृष्ण हां राधे कहने के लिए मजबूर कर देगी राधे कृष्ण की लीला आध्यात्मिक रस में डूबी आनंदमई लीला है मेरे बोलने में अगर कोई त्रुटि हो तो माफ करना

राधे कृष्ण  की कृपा से यह कथाएं भी अवश्य सुने

भगवान जगन्नाथ जब संत की स्वयं सेवा करने आते थे सत्य कथा
https://youtu.be/JhHeFjf3uYE

राधे राधे नाम की महिमा की बहुत ही सुंदर कथा अवश्य सुने
https://youtu.be/zpTGcNXFFmQ

श्रीमद्भगवद्गीता को पढ़ने के लिए और भगवान विष्णु के 24 अवतारों का वर्णन मेरे ब्लॉग में हैं अगर आप अच्छे विचारों और भगवान के विषय में बहुत ज्यादा जानना चाहते हैं तो मेरे ब्लॉग को भी सब्सक्राइब करिए जिसमें डेढ़ सौ से ज्यादा ब्लॉक्स हैं इनको पढ़कर भी आप अध्यात्म  की ओर चल सकते है link per click Karen

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शनिवार, 30 मई 2020

हर कार्य की सिद्धि होती है कामिका एकादशी कथा और महत्व

ॐ गं गणपतये नमः 

जय श्रीकृष्ण मित्रों ! आज कामिका एकादशी है जानते है इस का महत्व 

कामिका एकादशी


युधिष्ठिर ने पूछा : गोविन्द ! वासुदेव ! आपको मेरा नमस्कार है ! श्रावण (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार आषाढ़) के कृष्णपक्ष में कौन सी एकादशी होती है कृपया उसका वर्णन कीजिये ।

भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! सुनो । मैं तुम्हें एक पापनाशक उपाख्यान सुनाता हूँजिसे पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने नारदजी के पूछने पर कहा था ।

नारदजी ने प्रशन किया : हे भगवन् ! हे कमलासन ! मैं आपसे यह सुनना चाहता हूँ कि श्रवण के कृष्णपक्ष में जो एकादशी होती हैउसका क्या नाम हैउसके देवता कौन हैं तथा उससे कौन सा पुण्य होता हैप्रभो ! यह सब बताइये ।

ब्रह्माजी ने कहा : नारद ! सुनो । मैं सम्पूर्ण लोकों के हित की इच्छा से तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दे रहा हूँ । श्रावण मास में जो कृष्णपक्ष की एकादशी होती हैउसका नाम कामिका’ है । उसके स्मरणमात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है । उस दिन श्रीधरहरिविष्णुमाधव और मधुसूदन आदि नामों से भगवान का पूजन करना चाहिए ।

भगवान श्रीकृष्ण के पूजन से जो फल मिलता हैवह गंगाकाशीनैमिषारण्य तथा पुष्कर क्षेत्र में भी सुलभ नहीं है । सिंह राशि के बृहस्पति होने पर तथा व्यतीपात और दण्डयोग में गोदावरी स्नान से जिस फल की प्राप्ति होती हैवही फल भगवान श्रीकृष्ण के पूजन से भी मिलता है ।

जो समुद्र और वनसहित समूची पृथ्वी का दान करता है तथा जो कामिका एकादशी’ का व्रत करता हैवे दोनों समान फल के भागी माने गये हैं ।

जो ब्यायी हुई गाय को अन्यान्य सामग्रियोंसहित दान करता हैउस मनुष्य को जिस फल की प्राप्ति होती हैवही कामिका एकादशी’ का व्रत करनेवाले को मिलता है । जो नरश्रेष्ठ श्रावण मास में भगवान श्रीधर का पूजन करता हैउसके द्वारा गन्धर्वों और नागोंसहित सम्पूर्ण देवताओं की पूजा हो जाती है ।

अत: पापभीरु मनुष्यों को यथाशक्ति पूरा प्रयत्न करके कामिका एकादशी’ के दिन श्रीहरि का पूजन करना चाहिए । जो पापरुपी पंक से भरे हुए संसारसमुद्र में डूब रहे हैंउनका उद्धार करने के लिए कामिका एकादशी’ का व्रत सबसे उत्तम है । अध्यात्म विधापरायण पुरुषों को जिस फल की प्राप्ति होती हैउससे बहुत अधिक फल कामिका एकादशी’ व्रत का सेवन करनेवालों को मिलता है ।
कामिका एकादशी’ का व्रत करनेवाला मनुष्य रात्रि में जागरण करके न तो कभी भयंकर यमदूत का दर्शन करता है और न कभी दुर्गति में ही पड़ता है ।

लालमणिमोतीवैदूर्य और मूँगे आदि से पूजित होकर भी भगवान विष्णु वैसे संतुष्ट नहीं होतेजैसे तुलसीदल से पूजित होने पर होते हैं । जिसने तुलसी की मंजरियों से श्रीकेशव का पूजन कर लिया हैउसके जन्मभर का पाप निश्चय ही नष्ट हो जाता है ।

या दृष्टा निखिलाघसंघशमनी स्पृष्टा वपुष्पावनी
रोगाणामभिवन्दिता निरसनी सिक्तान्तकत्रासिनी ।
प्रत्यासत्तिविधायिनी भगवत: कृष्णस्य संरोपिता
न्यस्ता तच्चरणे विमुक्तिफलदा तस्यै तुलस्यै नम: ॥

जो दर्शन करने पर सारे पापसमुदाय का नाश कर देती हैस्पर्श करने पर शरीर को पवित्र बनाती हैप्रणाम करने पर रोगों का निवारण करती हैजल से सींचने पर यमराज को भी भय पहुँचाती हैआरोपित करने पर भगवान श्रीकृष्ण के समीप ले जाती है और भगवान के चरणों मे चढ़ाने पर मोक्षरुपी फल प्रदान करती हैउस तुलसी देवी को नमस्कार है ।

जो मनुष्य एकादशी को दिन रात दीपदान करता हैउसके पुण्य की संख्या चित्रगुप्त भी नहीं जानते । एकादशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण के सम्मुख जिसका दीपक जलता हैउसके पितर स्वर्गलोक में स्थित होकर अमृतपान से तृप्त होते हैं । घी या तिल के तेल से भगवान के सामने दीपक जलाकर मनुष्य देह त्याग के पश्चात् करोड़ो दीपकों से पूजित हो स्वर्गलोक में जाता है ।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : युधिष्ठिर ! यह तुम्हारे सामने मैंने कामिका एकादशी’ की महिमा का वर्णन किया है । कामिका’ सब पातकों को हरनेवाली हैअत: मानवों को इसका व्रत अवश्य करना चाहिए । यह स्वर्गलोक तथा महान पुण्यफल प्रदान करनेवाली है । जो मनुष्य श्रद्धा के साथ इसका माहात्म्य श्रवण करता हैवह सब पापों से मुक्त हो श्रीविष्णुलोक में जाता है


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गुरुवार, 30 जनवरी 2020

आप जानते है भगवान् विष्णु का महाशक्ति (६४ कला संपन्न) चौबीसवाँ अवतार कलयुग में होगा कब और कहाँ : कल्कि अवतार



1- श्री सनकादि मुनि,  2- वराह अवतार,  3- नारद अवतार,  4- नर-नारायण,  5- कपिल मुनि, 6- दत्तात्रेय अवतार, 7-  यज्ञ, 8- भगवान ऋषभदेव,  9- आदिराज पृथु, 10- मत्स्य अवतार,   11- कूर्म अवतार 12- भगवान धन्वन्तरि 13- मोहिनी अवतार  14- नरसिंह अवतार   15- वामन अवतार   16 - हयग्रीव अवतार 17- श्रीहरि अवतार 18 - परशुराम अवतार 19 -  महर्षि वेदव्यास  20 - हंस अवतार  21.  श्रीराम अवतार  22-  भगवान श्रीकृष्ण अवतार  23 -  बुद्ध अवतार

२४ - कल्कि अवतार  

धर्म ग्रंथों के अनुसार कलयुग में भगवान विष्णु कल्कि रूप में अवतार लेंगे। कल्कि अवतार कलियुग व सतयुग के संधिकाल में होगा।  पुराणों के अनुसार उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद जिले के शंभल नामक स्थान पर विष्णुयशा नामक तपस्वी ब्राह्मण के घर भगवान कल्कि पुत्र रूप में जन्म लेंगे। कल्कि देवदत्त नामक घोड़े पर सवार होकर संसार से पापियों का विनाश करेंगे और धर्म की पुन:स्थापना करेंगे।  


अब विस्तार से वर्णन :
श्रीमद्धभागवतपुराण अनुसार : 

नैमिषारण्य में सूत शौनक वार्ता चल रही थी। समस्त अवतारों की कथा लीला संदोह सुनने के उपरान्त ज्ञान की अन्यतम जिज्ञासा वाले शौनक मुनियों ने महर्षि लोमहर्षक के सुपुत्र श्री सूत जी से प्रश्न किया-भगवन्। द्वापर तक की व तदुपरांत बुद्धावतार की कथा पूरी हो चुकी। अब कृपया यह बताइये कि कलियुग जब पराकाष्ठा पर होगा तो भगवान का जन्म किस रूप में होगा। उस समय ऐसी कौन सी दुरात्माएं होंगी जिन्हें मारने के लिए भगवान अवतार लेंगे। वह कथा भी हमें विस्तार से सुनाएं।
श्री सूत जी बोले-हे मुनीश्वरो-ब्रह्माजी ने अपनी पीठ से घोर मलीन पातक को उत्पन्न किया, जिसका नाम रखा गया अधर्म। अधर्म जब बड़ा हुआ तब उसका मिथ्या से विवाह कर दिया गया। दोनों के संयोग से महाक्रोधी पुत्र दम्भ तथा माया नाम की कन्या जन्मी। फिर दम्भ व माया के संयोग से लोभ नामक पुत्र और विकृति नामक कन्या हुई। दोनों ने क्रोध को जन्म दिया। क्रोध से हिंसा व दोनों के संयोग से काली देह वाले महाभयंकर कलि का जन्म हुआ। काकोदर कराल, चंचल, भयानक, दुर्गन्धयुक्त शरीर, द्यूत, मद्य, स्वर्ण और वेश्या में निवास करने वाले इस कलि की बहिन व संतानों के रूप में दुरुक्ति, भयानक, मृत्यु निरथ, यातना का जन्म हुआ जिसके हजारों अधर्मी पुत्र-पुत्री आधि-व्याधि, बुढ़ापा, दुख शोक,पतन,भोग-विलास आदि में निवास कर यज्ञ, तप,दान, स्वाध्याय, उपासना आदि का नाश करने लगे।
 
पुराणकथाओं के अनुसार कलियुग में पाप की सीमा पार होने पर विश्व में दुष्टों के संहार क लिये कल्कि अवतार प्रकट होगा। कल्कि अवतार कलियुग के अन्त के लिये होगा। ये विष्णु जी के अवतारो मै से एक है। जब कलियुग मै लोग धर्म का अनुसरण करना बन्द कर देगे तब ये आवतार होगा। कल्कि की कथा कल्कि पुराण में आती है। कलियुग के अन्त में इक्कीसवीं बार विष्णु यश नामक ब्राह्मण के घर भगवान का कल्कि अवतार होगा| 
आज विश्व में मानवता त्राहि - त्राहि कर रही है और जो पापाचार बढ़ रहे हैं उनको देखकर बहुत कष्ट होता है। इस स्थिति में सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार भगवान के अवतार की ओर ध्यान जाता है। 
‘‘ यदा यदा हिधर्मस्य ग्लार्निभवति भारतःअभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम,परित्राणय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्, धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे।’’ 
अर्थात् जब - जब धर्म की हानि होती है, भूमि पर भार बढ़ता है तब-तब धर्म की संस्थापना के लिए, साधुजनों की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए मैं युग-युग में अवतार लेता हूँ। 
भगवान सूर्य के प्रकाश की पहली किरण जब भारत की पवित्र भूमि को छूती थी तो सारा वातावरण पूजा की घंटियों और शंखनाद से गूंज उठता था। मंदिरों के पट खुल जाते थे और भगवान का अभिषेक सारे भारत में एक साथ आरम्भ हो जाता था। भारत भूमि ऋषिओं और देवताओं की भूमि है, इसके कण - कण में आध्यात्मिक चेतना है, जो भगवान का नाम लेकर जागती थी और भगवान का कीर्तन करते हुए सोती थी। महर्षि वेद-व्यास जी ने श्रीमद् भागवत् के 12 स्कन्ध के दूसरे अध्याय में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि श्री कृष्ण जब अपनी लीला संवरण करके परम धाम को पधार गये उसी समय से कलियुग ने संसार में प्रवेश किया। उसी के कारण मनुष्यों की मति - गति पाप की ओर ढुलक गयी। धर्म कष्ट से प्राप्त होता है और अधः पतन सुखों से, इसलिए भोली भाली जनता को गिरने में देर नहीं लगी। 
सत्य सनातन धर्म शाश्वत धर्म है। भगवान का मानवता के उत्थान, दुष्टों के संहार, धर्म की संस्थापना और भक्तों की रक्षा के लिए पंच भौतिक संसार में साक्षात् होना ही अवतार कहलाता है। केवल भगवत् अवतार से ही धर्म की पूर्ण संस्थापना हो सकती है। महात्माओं के आने से केवल आंशिक रूप से ही सत्य की स्थापना हो पाती है। युग परिवर्तनकारी भगवान श्री कल्कि के अवतार का प्रायोजन विश्व कल्याण है। भगवान का यह अवतार ‘‘निष्कलंक भगवान’’ के नाम से भी जाना जायेगा।

भगवान का अवतार कहाँ होगा (विस्तार पूर्वक वर्णन) 
श्रीमद् भागवत महापुराण में विष्णु के अवतारों की कथाएं विस्तार से वर्णित हैं। इसके बारहवें स्कन्ध के द्वितीय अध्याय में भगवान के कल्कि अवतार की कथा कुछ विस्तार से दी गई, कहा गया है कि‘‘ सम्भल ग्राम, मुख्यस्य ब्राह्मणस्य महात्मनः भवने विष्णुयशसः कल्कि प्रादुर्भाविष्यति।। 
"सम्भल ग्राम में विष्णुयश नामक श्रेष्ठ ब्राह्मण के पुत्र के रूप में भगवान कल्कि का जन्म होगा।" 
"वे देवदत्त नाम के घोड़े पर आरूढ़ होकर अपनी कराल करवाल (तलवार) से दुष्टों का संहार करेंगे तभी सतयुग का प्रारम्भ होगा।" 
"समस्त विश्व का कल्याण इस अवतार का प्रायोजन है। भगवान श्री कल्कि निष्कलंक अवतार हैं।" 
"उनके पिता का नाम विष्णुयश और माता का नाम सुमति होगा।" 
"उनके भाई जो उनसे बड़े होंगे क्रमशः सुमन्त, प्राज्ञ और कवि नाम के नाम के होंगे।" 
"याज्ञवलक्य जी पुरोहित और भगवान परशुराम उनक गुरू होंगे।" 
"भगवान श्री कल्कि की दो पत्नियाँ होंगी - लक्ष्मी रूपी पद्मा और वैष्णवी शक्ति रूपी रमा।" 
"उनके पुत्र होंगे - जय, विजय, मेघमाल तथा बलाहक।"
 
भगवान का स्वरूप (सगुण रूप) परम दिव्य एवम् ज्योतिमय होता है। उनके स्परूप की कल्पना उनके परम अनुग्रह से ही की जा सकती है। भगवान श्री कल्कि अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड नायक हैं। शक्ति पुरूषोत्तम भगवान श्री कल्कि अद्वितीय हैं। भगवान श्री कल्कि दुग्ध वर्ण अर्थात् श्वेत अश्व पर सवार हैं। अश्व का नाम देवदत्त है। भगवान का रंग गोरा है, परन्तु क्रोध में काला भी हो जाता है। भगवान पीले वस्त्र धारण किये हैं। प्रभु के हृदय पर श्रीवत्स का चिह्न अंकित है। गले में कौस्तुभ मणि सुशोभित है। भगवान पूर्वाभिमुख व अश्व दक्षिणामुख है। भगवान श्री कल्कि के वामांग में लक्ष्मी (पद्मा) और दाएं भाग में वैष्णवी (रमा) विराजमान हैं। पद्मा भगवान की स्वरूपा शक्ति और रमा भगवान की संहारिणी शक्ति हैं। भगवान के हाथों में प्रमुख रूप से नन्दक व रत्नत्सरू नामक खड्ग (तलवार) है। शाऽग नामक धनुष और कुमौदिकी नामक गदा है। भगवान कल्कि के हाथ में पांचजन्य नाम का शंख है। भगवान के रथ अत्यन्त सुन्दर व विशाल हैं। रथ का नाम जयत्र व गारूड़ी है। सारथी का नाम दारूक है। भगवान सर्वदेवमय व सर्ववेदमय हैं। सब उनकी विराट स्वरूप की परिधि में हैं। भगवान के शरीर से परम दिव्य गंध उत्पन्न होती है जिसके प्रभाव से संसार का वातावरण पावन हो जाता है।


रविवार, 9 जुलाई 2017

गुरु पूर्णिमा महोत्सव

ॐ गं गणपतये नमः 

जय श्रीकृष्ण मित्रों ! गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर, विश्व के समस्त गुरुजनों को मेरा शत् शत् नमन। गुरु के महत्व को हमारे सभी संतो, ऋषियों एवं महान विभूतियों ने उच्च स्थान दिया है।संस्कृत में ‘गु’ का अर्थ होता है अंधकार (अज्ञान)एवं ‘रु’ का अर्थ होता है प्रकाश(ज्ञान)। गुरु हमें अज्ञान रूपी अंधकार से ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर ले जाते हैं।

सम्पूर्ण भारत में गुरु पूर्णिमा पर्व आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को श्रद्धाभाव व उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। यह पर्व जीवन में गुरु की महत्ता व महर्षि वेद व्यास को समर्पित है। भारतवर्ष में कई विद्वान गुरु हुए हैं, किन्तु महर्षि वेद व्यास प्रथम विद्वान थे, जिन्होंने सनातन धर्म (हिन्दू धर्म) के चारों वेदों की व्याख्या की थी। सिख धर्म में भी गुरु को भगवान माना जाता इस कारण गुरु पूर्णिमा सिख धर्म का भी अहम त्यौहार बन चुका है।

सिख धर्म केवल एक ईश्वर और अपने दस गुरुओं की वाणी को ही जीवन का वास्तविक सत्य मानता है। सिख धर्म की एक प्रचलित कहावत निम्न है:
‘गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागू पांव, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए'।।
गुरु पूर्णिमा आध्यात्मिक सम्बन्ध याद करने के लिए नियत है गुरु पूर्णिमा के दिन परमात्मा वहुत खुश होते है उस दिन हर दरवाजा भक्त के लिए खुला होता है वो जो चाहे परमेश्वर से मांग सकता है उस दिन भक्त के द्वारा लिया हुआ हर एक संकल्प पूर्ण होता है और कोई विरोध नहीं होता, उस दिन भक्त के द्वारा किया गया  भजन, पाठ, आराधन, जप, ध्यान, लाखो गुना फल देता है गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व अपने गुरु को शुक्रिया करने, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए भी है कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए समर्पण एक विधि है इस दिन शिष्य अपने सद्गुरु को समर्पण के द्वारा शुक्रिया कहता है समर्पण तीन तरह से कर सकते है
(1)तन का समर्पण –  शारीरिक सेवा दे कर
(2) मन का समर्पण – जप ध्यान आराधन करके

(3) धन का समर्पण – अपने धन में से कुछ समर्पण करके

शास्त्र कहते है कि इस दिन शिष्य जो कुछ समर्पण करता है उसका लाखो गुना वापस पाता है जैसे अगर शारीरक सेवा द्वारा समर्पण किया जाये तो शिष्य की शारीरक स्वस्थता और सामर्थ्य बढ़ता है, मन का समर्पण करने से मन बलवान होता है,और धन का समर्पण करने से एक तो धन पवित्र होता है, और दूसरा उसमे कई गुना वृद्धि होती है, तो ये महत्वपूर्ण दिन व्यर्थ मत जाने दीजियेगा कुछ न कुछ समर्पण जरूर कीजियेगा।

जय श्रीकृष्ण मित्रों ! 

गुरुवार, 6 जुलाई 2017

आप जानते है भगवान विष्णु का योगनिद्रा काल : चातुर्मास कहलाता है (भाग - दूसरा)

ॐ गं गणपतये नमः 



जय श्रीकृष्ण मित्रों ! आप ने शयनी एकादशी के विषय में पढ़ा। देवशयनी एकादशी के साथ ही चातुर्मास शुरू हो जाता है। कल इस विषय के बारे में पढ़ा। आज आगे बढ़े
इन चार महीनों के दौरान मनोरम माहौल और प्रफुल्लित चित्त के साथ प्रकृति के शांत वातावरण में ईश्वर की आराधना पर खासतौर से बल दिया गया है। व्यक्ति के किसी मांगलिक कार्यक्रमों में लिप्त नहीं होने से वह बाहरी जवाबदारियों से मुक्त होकर ईश्वर की भक्ति में ध्यान लगा सकता है। चातुर्मास के चार महीनों यानी सावन, भादौ, आश्विन और कार्तिक माह में खाने-पाने और व्रत व उपवास की सलाह दी गई है। चातुर्मास में व्यक्ति की पाचनशक्ति कमजोर पड़ जाती है, इसलिए इस संपूर्ण महीने में व्यक्ति को व्रत व उपवास करने की सलाह दी गई है। खासकर कि इस समय के दौरान पड़ने वाली तमाम एकादशियों में निर्जला उपवास किया जाता है। यदि सभी एकदशियों में निर्जल उपवास नहीं हो पाए तो कम से कम तीन एकादशी (देवशयनी, जलजिलनी और देव उठनी एकादशी) के दिन निर्जल उपवास जरुर करना चाहिए एेसा संतजनों का कहना है।


गुरु पूर्णिमा, हरियाली तीज, नागपंचमी, रक्षाबंधन, कृष्ण जन्माष्टमी, विजयदशमी, अहोई अष्टमी, करवा चौथ, दीपावली, भैया दूज, छठ पूजा और नदी स्नान के विशेष महत्व वाली कार्तिक पूर्णिमा ऐसे ही मौके हैं। चातुर्मास में 'पितृपक्ष' का पखवाड़ा और नवरात्र के नौ दिन ऐसे अवसर होते हैं, जब स्वास्थ्य और अध्यात्म दोनों की दृष्टि से आम गृहस्थ को विशेष निर्देश की जरूरत होती है।


गुरु पूर्णिमा का बड़ा महत्‍व

गुरु का स्थान गोविंद से आगे यूं ही नहीं माना गया। चतुर्मास में भूलोक की पालना का भार गुरुवर्ग के भरोसे छोड़कर ही भगवान श्री विष्णु शयन करने पाताल लोक जाते हैं। इसीलिए गुरु भी इस चतुर्मास में कहीं नहीं जाते। शिष्यों को पूर्व सूचना के साथ पूर्व निर्धारित एक ही स्थान पर रहते हैं। इसीलिए चतुर्मास की पहली पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहा जाता है। शिष्य गुरु को साक्षात अपने सामने बिठाकर पूजा करते हैं। (गुरु पूर्णिमा का वर्णन अगले ब्लॉग में करुँगा)

आयुर्वेद की दृष्टि से चातुर्मास : आयुर्वेद की दृष्टि से भी उपवास के लिए यह समय उत्तम माना गया है। वजह यह है कि श्रावण के महीने में हरी सब्जियों में सूक्ष्म जंतुओं के होने की संभावनाए बहुत होने से अंकुरित चीजों को खाने की सलाह दी जाती है। भादों की बरसात के बाद जलवायु परिवर्तन की वजह से एकाएक गर्मी बढ़ जाती है। एेसे में यदि इंसान दही का सेवन करता है तो पित्त या अम्ल की समस्या का शिकार हो सकता है। इससे बचने के लिए दही को खाने के लिए वर्जित कहा गया है। इसके अलावा, इन आषाढ़ माह में दूध पीने से पानी से पैदा होने वाले रोग और कार्तिक माह में दाल को सेवन करने से अपच की समस्या हो सकती है, इसलिए इस दौरान इन आहार का सेवन करने की मनाही की गई है। 
चातुर्मास के दौरान श्रावण महीने में विविध त्यौहारों में उपवास के अलावा भादो में पितृ तर्पण  और आषाढ़ में नवरात्रि की पूर्जा-अर्चना-अनुष्ठान और उपवास द्वारा धार्मिक और आध्यात्मिक संतुलन बनाने के साथ-साथ शारीरिक आरोग्यता की दिशा में भी हमारे शास्त्रों में विस्तारपूर्वक वर्णन किया ग
या है।