सोमवार, 24 अप्रैल 2017

श्रीमद्भगवद्गीता पन्द्रहवाँ अध्याय : पुरुषोत्तमयोग (हिन्दी में व्याख्या)

ॐ श्रीपरमात्मने नमः 

पुरुषोत्तमयोग 
पन्द्रहवाँ अध्याय

हिंदी में व्याख्या
भगवान ने कहा - हे अर्जुन! इस संसार को अविनाशी वृक्ष कहा गया है, जिसकी जड़ें ऊपर की ओर हैं और शाखाएँ नीचे की ओर तथा इस वृक्ष के पत्ते वैदिक स्तोत्र है, जो इस अविनाशी वृक्ष को जानता है वही वेदों का जानकार है। (१)

इस संसार रूपी वृक्ष की समस्त योनियाँ रूपी शाखाएँ नीचे और ऊपर सभी ओर फ़ैली हुई हैं, इस वृक्ष की शाखाएँ प्रकृति के तीनों गुणों द्वारा विकसित होती है, इस वृक्ष की इन्द्रिय-विषय रूपी कोंपलें है, इस वृक्ष की जड़ों का विस्तार नीचे की ओर भी होता है जो कि सकाम-कर्म रूप से मनुष्यों के लिये फल रूपी बन्धन उत्पन्न करती हैं। (२)

इस संसार रूपी वृक्ष के वास्तविक स्वरूप का अनुभव इस जगत में नहीं किया जा सकता है क्योंकि न तो इसका आदि है और न ही इसका अन्त है और न ही इसका कोई आधार ही है, अत्यन्त दृड़ता से स्थित इस वृक्ष को केवल वैराग्य रूपी हथियार के द्वारा ही काटा जा सकता है। (३)

वैराग्य रूपी हथियार से काटने के बाद मनुष्य को उस परम-लक्ष्य (परमात्मा)के मार्ग की खोज करनी चाहिये, जिस मार्ग पर पहुँचा हुआ मनुष्य इस संसार में फिर कभी वापस नही लौटता है, फिर मनुष्य को उस परमात्मा के शरणागत हो जाना चाहिये, जिस परमात्मा से इस आदि-रहित संसार रूपी वृक्ष की उत्पत्ति और विस्तार होता है। (४)

जो मनुष्य मान-प्रतिष्ठा और मोह से मुक्त है तथा जिसने सांसारिक विषयों में लिप्त मनुष्यों की संगति को त्याग दिया है, जो निरन्तर परमात्म स्वरूप में स्थित रहता है, जिसकी सांसारिक कामनाएँ पूर्ण रूप से समाप्त हो चुकी है और जिसका सुख-दुःख नाम का भेद समाप्त हो गया है ऎसा मोह से मुक्त हुआ मनुष्य उस अविनाशी परम-पद(परम-धाम) को प्राप्त करता हैं। (५)

उस परम-धाम को न तो सूर्य प्रकाशित करता है, न चन्द्रमा प्रकाशित करता है और न ही अग्नि प्रकाशित करती है, जहाँ पहुँचकर कोई भी मनुष्य इस संसार में वापस नहीं आता है वही मेरा परम-धाम है। (६)

हे अर्जुन! संसार में प्रत्येक शरीर में स्थित जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है, जो कि मन सहित छहों इन्द्रियों के द्वारा प्रकृति के अधीन होकर कार्य करता है। (७)

शरीर का स्वामी जीवात्मा छहों इन्द्रियों के कार्यों को संस्कार रूप में ग्रहण करके एक शरीर का त्याग करके दूसरे शरीर में उसी प्रकार चला जाता है जिस प्रकार वायु गन्ध को एक स्थान से ग्रहण करके दूसरे स्थान में ले जाती है। (८)

इस प्रकार दूसरे शरीर में स्थित होकर जीवात्मा कान, आँख, त्वचा, जीभ, नाक और मन की सहायता से ही विषयों का भोग करता है। (९)

जीवात्मा शरीर का किस प्रकार त्याग कर सकती है, किस प्रकार शरीर में स्थित रहती है और किस प्रकार प्रकृति के गुणों के अधीन होकर विषयों का भोग करती है, मूर्ख मनुष्य कभी भी इस प्रक्रिया को नहीं देख पाते हैं केवल वही मनुष्य देख पाते हैं जिनकी आँखें ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित हो गयी हैं। (१०)

योग के अभ्यास में प्रयत्नशील मनुष्य ही अपने हृदय में स्थित इस आत्मा को देख सकते हैं, किन्तु जो मनुष्य योग के अभ्यास में नहीं लगे हैं ऐसे अज्ञानी प्रयत्न करते रहने पर भी इस आत्मा को नहीं देख पाते हैं। (११)

हे अर्जुन! जो प्रकाश सूर्य में स्थित है जिससे समस्त संसार प्रकाशित होता है, जो प्रकाश चन्द्रमा में स्थित है और जो प्रकाश अग्नि में स्थित है, उस प्रकाश को तू मुझसे ही उत्पन्न समझ। (१२)

मैं ही प्रत्येक लोक में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सभी प्राणीयों को धारण करता हूँ और मैं ही चन्द्रमा के रूप से वनस्पतियों में जीवन-रस बनकर समस्त प्राणीयों का पोषण करता हूँ। (१३)

मैं ही पाचन-अग्नि के रूप में समस्त जीवों के शरीर में स्थित रहता हूँ, मैं ही प्राण वायु और अपान वायु को संतुलित रखते हुए चार प्रकार के (चबाने वाले, पीने वाले, चाटने वाले और चूसने वाले) अन्नों को पचाता हूँ। (१४)

मैं ही समस्त जीवों के हृदय में आत्मा रूप में स्थित हूँ, मेरे द्वारा ही जीव को वास्तविक स्वरूप की स्मृति, विस्मृति और ज्ञान होता है, मैं ही समस्त वेदों के द्वारा जानने योग्य हूँ, मुझसे ही समस्त वेद उत्पन्न होते हैं और मैं ही समस्त वेदों को जानने वाला हूँ। (१५)

हे अर्जुन! संसार में दो प्रकार के ही जीव होते हैं एक नाशवान (क्षर) और दूसरे अविनाशी (अक्षर), इनमें समस्त जीवों के शरीर तो नाशवान होते हैं और समस्त जीवों की आत्मा को अविनाशी कहा जाता है। (१६)

परन्तु इन दोनों के अतिरिक्त एक श्रेष्ठ पुरुष है जिसे परमात्मा कहा जाता है, वह अविनाशी भगवान तीनों लोकों में प्रवेश करके सभी प्राणीयों का भरण-पोषण करता है। (१७)

क्योंकि मैं ही क्षर और अक्षर दोनों से परे स्थित सर्वोत्तम हूँ, इसलिये इसलिए संसार में तथा वेदों में पुरुषोत्तम रूप में विख्यात हूँ। (१८)

हे भरतवंशी अर्जुन! जो मनुष्य इस प्रकार मुझको संशय-रहित होकर भगवान रूप से जानता है, वह मनुष्य मुझे ही सब कुछ जानकर सभी प्रकार से मेरी ही भक्ति करता है। (१९)

हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह शास्त्रों का अति गोपनीय रहस्य मेरे द्वारा कहा गया है, हे भरतवंशी जो मनुष्य इस परम-ज्ञान को इसी प्रकार से समझता है वह बुद्धिमान हो जाता है और उसके सभी प्रयत्न पूर्ण हो जाते हैं। (२०)



सदा शांत रहना सिखाती है गीता,
दुःख दर्द सब का मिटाती है गीता।
जो भटके हैं गलती से इस जिन्दगी में,
उन्हें शान्ति की राह दिखाती है गीता। 

रविवार, 23 अप्रैल 2017

श्रीमद्भगवद्गीता का पन्द्रहवाँ अध्याय : पुरुषोत्तमयोग

ॐ श्रीपरमात्मने नमः 































पुरुषोत्तमयोग 
पन्द्रहवाँ अध्याय 
जय श्रीकृष्ण मित्रों ! चौदहवे अध्याय में श्लोक ५ से १९ तक तीनों गुणों का स्वरूप, उनके कार्य उनका बंधनस्वरूप और बंधे हुए मनुष्य की उत्तम, मध्यम आदि गतियों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया।  श्लोक १९ तथा २० में उन गुणों से रहित होकर भगवदभाव को पाने का उपाय और फल बताया।  फिर अर्जुन के पूछने से २२वे श्लोक से लेकर २५ वें श्लोक तक गुणातीत पुरुष के लक्षणों एवं आचरण का वर्णन किया। २६ वे श्लोक में सगुण परमेश्वर को अनन्य भक्तियोग तथा गुणातीत होकर ब्रह्मप्राप्ति का पात्र बनाने का सरल उपाय बताया। 
अब वह भक्तियोगरूप अनन्य प्रेम उन्पन्न करने के उद्देश्य से सगुण परमेश्वर के गुण, प्रभाव और स्वरूप का तथा गुणातीत होने में मुख्य साधन वैराग्य और भगवद्शरण का वर्णन करने के लिए पन्द्रहवाँ अध्याय शुरू करते है।  इसमें प्रथम संसार से वैराग्य पैदा करने हेतु भगवान् तीन श्लोक द्वारा वृक्ष के रूप में संसार का वर्णन करके वैराग्यरूप शस्त्र द्वारा उसे काट डालने को कहते है। 

श्रीभगवानुवाच ---
सुन अब ऐसे पीपल का अर्जुन बयाँ,
जड़े जिस की ऊपर तले डालियाँ। 
शजर लफ़ना जिस के पत्ते हैं वेद,
वो हैं वेद-दाँ पाये जो इस का भेद। (१)

गुणों से बढ़ें डालियाँ लाकलाम,
हैं आशियाये महसूस गुन्चे तमाम। 
जड़े इस की इन्सां की दुनिया तक आयें,
जकड़ कर इसे कर्म से बांध जाये। (२)

तसव्वर में शक्ल इस की आये कहाँ,
न अव्वल न आख़िर न जड़ का निशाँ। 
जड़े इस की मज़बूत हैं चार-सू,
यह शमशीर तजरीद से काट तू। (३)

इन्हें काट कर ढूंढ फिर वो मुकाम,
जहाँ जा के तू फिर न लौटे मुदाम। 
तू कह "मुझ को परमेश्वर की अमाँ,
किया जिस ने हस्ती का दरिया रवाँ।" (४)

फ़रेब-ओ तकब्बर से पा कर निजात,
हवस छोड़ कर जो रहें महव-ए जात। 
तअल्लुक न सुख-दुःख के इज़दाद हों,
मुकाम-ए अबद पा के दिल शाद हों। (५)

जले मेहर-ओ माह की न मिशल वहाँ,
न हो उस जगह आग शोलाह-फ़िशां। 
मुकाम-ए मुअल्ला मेरा है वही,
पहुंच कर जहाँ से न लौटे कोई। (६)

मेरी आत्मा ही का जुज्ब-ए कदीम,
बने रूह हो एहल-ए जाँ में मकीम। 
जो माया में लिपटे हैं मन और हवास,
यही रूह खींचे उन्हें अपने पास। (७)

जहाँ ईश्वर यानी जीवात्मा,
हो इक तन में दख़ल और इक से जुदा। 
तो साथ अपने ले जाये मन और हवास,
सबा जैसे ले जाये फूलों की बास। (८)

ज़बाँ कान मस आँख और नाक से,
इन्हें पांच और मन के अदराक से। 
यही रूह लज़्जत उड़ाते रहे,
सदा लुत्फ़-ए महसूस पाती रहे। (९)

मुसाहिर जो आया जो आ कर गया,
जो लुत्फ़ इन गुणों का उठा कर गया। 
नहीं इस को गुमराह पहचानते,
हैं ऐहल-ए बसीरत फ़कत जानते। (१०)

जो योगी रियाज़त में कोशां रहे,
तो वो भी उसे रूह में देख ले। 
वो मूऱख़ हैं कमजोर जिन के शऊर,
करे लाख कोशिश न पायें वो नूर। (११)

यह सूरज की ताबिश मेरा नूर हैं,
जहाँ जिस के जलवों से मामूर हैं। 
रहे चाँद रखशां मेरे नूर से,
तो आतिश दरखाशां मेरी नूर से। (१२)

जमीं में जो करता हूँ खुद को निहाँ,
तो क़ुव्वत से मेरी क़ुव्वत-ए जहाँ। 
बनूँ नूर-ए महताब की आब मैं,
तो करता हूँ पौदों को शादाब मैं। (१३)

हरारत हूँ मैं ही शिकम में निहाँ,
मैं हूँ जान वालों के तन में तवां। 
दरूँ-ओ बरूँ दम में आता हूँ मैं,
तो चारों गिजाये पचाता हूँ मैं। (१४)

हर इन्सां के दिल में हूँ पिनहाँ भी मैं,
कि हूँ हाफ़ज़ा इल्म नस्याँ भी मैं। 
मैं दाना हूँ रोशन हैं सब मुझ से वेद,
है वेदान्त मुझ से, मैं वेदों का भेद। (१५)

जहाँ में हैं दो तरह की हस्तियाँ,
है फ़ानी कोई और कोई जावदाँ। 
जहाँ की है मख़लूक फ़ानी तमाम,
अजल से जो बाक़ी है उस को दवाम। (१६)

वो परमेश्वर हैं वो परमात्मा,
जो है सब पे छाया हुआ ला-फ़ना। 
है बाक़ी व फ़ानी से बाला वो हक,
कि कायम हुए जिस से तीनों तबक। (१७)

जो फ़ानी हैं ज़ात उन से मेरी बुलन्द,
जो बाकी है बात उन से मेरी बुलन्द। 
है पुरुषोत्तम अपना जमाने में नाम,
यही नाम लें वेद-दां और अवाम। (१८)

जो पुरुषोत्तम इस तरह जाने मुझे,
दिल-ए हक नज़र से जो माने मुझे। 
तो भारत समझ बाख़बर है वही,
वो तन मन से करता है भक्ति मेरी। (१९)

सिखाया तुझे भारत ऐ पाकबाज़,
यह इल्मो का इल्म और राज़ो का राज़। 
जो समझे इसे साहिब-ए होश हो,
फ़रायज से अपने सुबुकदोष हो। (२०)


(पन्द्रहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ)

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शनिवार, 22 अप्रैल 2017

श्रीमद्भागवत गीता का चौदहवाँ अध्याय : गुणत्रयविभागयोग (हिन्दी में व्याख्या)

ॐ श्रीपरमात्मने नमः 










गुणत्रयविभागयोग

चौदहवाँ अध्याय 

जय श्रीकृष्ण मित्रों !  कल आपने गुणत्रयविभागयोग का पठन किया।  आज इस अध्याय की हिन्दी में व्याख्या है ---
भावार्थ : श्री भगवान ने कहा - हे अर्जुन! समस्त ज्ञानों में भी सर्वश्रेष्ठ इस परम-ज्ञान को मैं तेरे लिये फिर से कहता हूँ, जिसे जानकर सभी संत-मुनियों ने इस संसार से मुक्त होकर परम-सिद्धि को प्राप्त किया हैं। (१)

इस ज्ञान में स्थिर होकर वह मनुष्य मेरे जैसे स्वभाव को ही प्राप्त होता है, वह जीव न तो सृष्टि के प्रारम्भ में फिर से उत्पन्न ही होता हैं और न ही प्रलय के समय कभी व्याकुल होता हैं। (२)

हे भरतवंशी! मेरी यह आठ तत्वों वाली जड़ प्रकृति (जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार) ही समस्त वस्तुओं को उत्पन्न करने वाली योनि (माता) है और मैं ही ब्रह्म (आत्मा) रूप में चेतन-रूपी बीज को स्थापित करता हूँ, इस जड़-चेतन के संयोग से ही सभी चर-अचर प्राणीयों का जन्म सम्भव होता है। (३)

हे कुन्तीपुत्र! समस्त योनियों जो भी शरीर धारण करने वाले प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सभी को धारण करने वाली ही जड़ प्रकृति ही माता है और मैं ही ब्रह्म(आत्मा) रूपी बीज को स्थापित करने वाला पिता हूँ। (४)

हे महाबाहु अर्जुन! सात्विक गुण, राजसिक गुण और तामसिक गुण यह तीनों गुण भौतिक प्रकृति से ही उत्पन्न होते हैं, प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुणों के कारण ही अविनाशी जीवात्मा शरीर में बँध जाती हैं। (५)

हे निष्पाप अर्जुन! सतोगुण अन्य गुणों की अपेक्षा अधिक शुद्ध होने के कारण पाप-कर्मों से जीव को मुक्त करके आत्मा को प्रकाशित करने वाला होता है, जिससे जीव सुख और ज्ञान के अहंकार में बँध जाता है। (६)

हे कुन्तीपुत्र! रजोगुण को कामनाओं और लोभ के कारण उत्पन्न हुआ समझ, जिसके कारण शरीरधारी जीव सकाम-कर्मों (फल की आसक्ति) में बँध जाता है। (७)

हे भरतवंशी! तमोगुण को शरीर के प्रति मोह के कारण अज्ञान से उत्पन्न हुआ समझ, जिसके कारण जीव प्रमाद (पागलपन में व्यर्थ के कार्य करने की प्रवृत्ति), आलस्य (आज के कार्य को कल पर टालने की प्रवृत्ति) और निद्रा (अचेत अवस्था में न करने योग्य कार्य करने की प्रवृत्ति) द्वारा बँध जाता है। (८)

हे अर्जुन! सतोगुण मनुष्य को सुख में बाँधता है, रजोगुण मनुष्य को सकाम कर्म में बाँधता है और तमोगुण मनुष्य के ज्ञान को ढँक कर प्रमाद में बाँधता है। (९)

हे भरतवंशी अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण के घटने पर सतोगुण बढ़ता है, सतोगुण और रजोगुण के घटने पर तमोगुण बढ़ता है, इसी प्रकार तमोगुण और सतोगुण के घटने पर तमोगुण बढ़ता है। (१०)

जिस समय इस के शरीर सभी नौ द्वारों (दो आँखे, दो कान, दो नथुने, मुख, गुदा और उपस्थ) में ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न होता है, उस समय सतोगुण विशेष बृद्धि को प्राप्त होता है। (११)

हे भरतवंशीयों में श्रेष्ठ! जब रजोगुण विशेष बृद्धि को प्राप्त होता है तब लोभ के उत्पन्न होने कारण फल की इच्छा से कार्यों को करने की प्रवृत्ति और मन की चंचलता के कारण विषय-भोगों को भोगने की अनियन्त्रित इच्छा बढ़ने लगती है। (१२)

हे कुरुवंशी अर्जुन! जब तमोगुण विशेष बृद्धि को प्राप्त होता है तब अज्ञान रूपी अन्धकार, कर्तव्य-कर्मों को न करने की प्रवृत्ति, पागलपन की अवस्था और मोह के कारण न करने योग्य कार्य करने की प्रवृत्ति बढने लगती हैं। (१३)

जब कोई मनुष्य सतोगुण की वृद्धि होने पर मृत्यु को प्राप्त होता है, तब वह उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल स्वर्ग लोकों को प्राप्त होता है। (१४)

जब कोई मनुष्य रजोगुण की बृद्धि होने पर मृत्यु को प्राप्त होता है तब वह सकाम कर्म करने वाले मनुष्यों में जन्म लेता है और उसी प्रकार तमोगुण की बृद्धि होने पर मृत्यु को प्राप्त मनुष्य पशु-पक्षियों आदि निम्न योनियों में जन्म लेता है। (१५)

सतोगुण में किये गये कर्म का फल सुख और ज्ञान युक्त निर्मल फल कहा गया है, रजोगुण में किये गये कर्म का फल दुःख कहा गया है और तमोगुण में किये गये कर्म का फल अज्ञान कहा गया है। (१६)

सतोगुण से वास्तविक ज्ञान उत्पन्न होता है, रजोगुण से निश्चित रूप से लोभ ही उत्पन्न होता है और तमोगुण से निश्चित रूप से प्रमाद, मोह, अज्ञान ही उत्पन्न होता हैं। (१७)

सतोगुण में स्थित जीव स्वर्ग के उच्च लोकों को जाता हैं, रजोगुण में स्थित जीव मध्य में पृथ्वी-लोक में ही रह जाते हैं और तमोगुण में स्थित जीव पशु आदि नीच योनियों में नरक को जाते हैं। (१८)

जब कोई मनुष्य प्रकृति के तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता है और स्वयं को दृष्टा रूप से देखता है तब वह प्रकृति के तीनों गुणों से परे स्थित होकर मुझ परमात्मा को जानकर मेरे दिव्य स्वभाव को ही प्राप्त होता है। (१९)

जब शरीरधारी जीव प्रकृति के इन तीनों गुणों को पार कर जाता है तब वह जन्म, मृत्यु, बुढापा तथा सभी प्रकार के कष्टों से मुक्त होकर इसी जीवन में परम-आनन्द स्वरूप अमृत का भोग करता है। (२०)

अर्जुन ने पूछा - हे प्रभु! प्रकृति के तीनों गुणों को पार किया हुआ मनुष्य किन लक्षणों के द्वारा जाना जाता है और उसका आचरण कैसा होता है तथा वह मनुष्य प्रकृति के तीनों गुणों को किस प्रकार से पार कर पाता है?। (२१)

श्री भगवान ने कहा - जो मनुष्य ईश्वरीय ज्ञान रूपी प्रकाश (सतोगुण) तथा कर्म करने में आसक्ति (रजोगुण) तथा मोह रूपी अज्ञान (तमोगुण) के बढने पर कभी भी उनसे घृणा नहीं करता है तथा समान भाव में स्थित होकर न तो उनमें प्रवृत ही होता है और न ही उनसे निवृत होने की इच्छा ही करता है। (२२)

जो उदासीन भाव में स्थित रहकर किसी भी गुण के आने-जाने से विचलित नही होता है और गुणों को ही कार्य करते हुए जानकर एक ही भाव में स्थिर रहता है। (२३)

जो सुख और दुख में समान भाव में स्थित रहता है, जो अपने आत्म-भाव में स्थित रहता है, जो मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण को एक समान समझता है, जिसके लिये न तो कोई प्रिय होता है और न ही कोई अप्रिय होता है, तथा जो निन्दा और स्तुति में अपना धीरज नहीं खोता है। (२४)

जो मान और अपमान को एक समान समझता है, जो मित्र और शत्रु के पक्ष में समान भाव में रहता है तथा जिसमें सभी कर्मों के करते हुए भी कर्तापन का भाव नही होता है, ऎसे मनुष्य को प्रकृति के गुणों से अतीत कहा जाता है। (२५)

जो मनुष्य हर परिस्थिति में बिना विचलित हुए अनन्य-भाव से मेरी भक्ति में स्थिर रहता है, वह भक्त प्रकृति के तीनों गुणों को अति-शीघ्र पार करके ब्रह्म-पद पर स्थित हो जाता है। (२६)

उस अविनाशी ब्रह्म-पद का मैं ही अमृत स्वरूप, शाश्वत स्वरूप, धर्म स्वरूप और परम-आनन्द स्वरूप एक-मात्र आश्रय हूँ। (२७)


इस प्रकार उपनिषद, ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र रूप श्रीमद् भगवद् गीता के श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद में प्राकृतिक गुण विभाग-योग नाम का चौदहवाँ अध्याय संपूर्ण हुआ ॥

                                                     ॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥




शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

चौदहवाँ अध्याय : गुणत्रयविभागयोग

ॐ श्रीपरमात्मने नमः 














गुणत्रयविभागयोग 
चौदहवाँ अध्याय 
जय श्रीकृष्ण मित्रों ! तेरहवें अध्याय में 'क्षेत्र' और 'क्षेत्रज्ञ' के लक्षण बताकर उन दोनों के ज्ञान को ही ज्ञान कहा और क्षेत्र का स्वरूप, स्वभाव विकार तथा उसके तत्वों की उत्पति का क्रम आदि बताया। २१ वें श्लोक में यह बात भी बताया कि पुरुष का फिर-फिर से अच्छी या अधम योनियों में जन्म पाने का कारण गुणों का संग ही है।  अब उस सत्व, रज और तम इन तीनो गुणों के भिन्न-भिन्न स्वरूप कौन से है, जीवात्मा को शरीर में किस तरह बांधते हैं, कौन से गुण के संग से किस योनि में जन्म होता है, गुणों से छूटने का उपाय कौनसा है, गुणों से छूटे हुए पुरुष का लक्षण तथा आचरण कैसा होता है..... इन सब बातो को जानने की स्वाभाविक ही इच्छा होती है। इसलिए उस विषय को स्पष्ट करने के लिए चौदहवे अध्याय का आरम्भ करते है। 
तेरहवे अध्याय में वर्णन किये गए ज्ञान को ज्यादा स्पष्टता पूर्वक समझाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण चौदहवे अध्याय के पहले श्लोक में ज्ञान का महत्व बताकर फिर से उसका वर्णन करते है। 

श्रीभगवानुवाच --
फिर अर्जुन से भगवान् बोले कि सुन,
जो ज्ञानों का है ज्ञान सुन उस के गुण। 
मुनि जिस को यह ज्ञान हासिल हुआ,
कमाल-ए फ़ज़ीलत से वासिल हुआ। (१)

जो लेते हैं इस ज्ञान का आसरा,
वो यक-रंग हो जायें मुझ से सदा। 
जो पैदा हो दुनिया तो आये न वो,
फ़ना हो तो तकलीफ़ पाये न वो। (२)

शिकम है मेरी कुदरत-ए कामला,
जो मैं तुख़्म डालूं तो हो हामला। 
यही है महाब्रह्म असल-ए हयात,
कि भारत इसी से हो कुल कायनात। (३)

किसी पेट से कोई पाये जनम,
हो अर्जुन कोई शक्ल, कोई शिकम। 
शिकम है महा-ब्रह्म मैं बाप हूँ,
कि बीज इस में मैं डालता आप हूँ। (४)

नमूदार माया से हों तीन गुण,
सतोगुण रजोगुण तमोगुण यह सुन। 
जो है ला-फ़ना रूह तन में मकीं,
ये गुण कैद करते हैं उस को वहीं। (५)

सतोगुण की फ़ितरत है पाकीजा नूर,
न ऐब इस में अर्जुन न कोई कसूर। 
करे रूह को शौक-ए राहत से कैद,
करे रूह को ज़ौक़-ए दानिश का सैद। (६)

रजोगुण की फ़ितरत है जज़्बात की,
है संगत का शौक उस की और तिशनगी। 
यह जौक-ए अमल का बनाती है जाल,
करे रूह को क़ैद कुन्ती के लाल। (७)

तमोगुण जहालत की औलाद है,
कब इस में मकीं तन का आज़ाद है। 
करे कैद धोखे से भारत इसे,
करे ख्वाब-ओ गफलत से ग़ारत इसे। (८)

सतोगुण का रहता है सुख से लगाओ,
रजोगुण का शौक-ए अमल है सुभाओ। 
तमोगुण  का पर्दा पड़े ज्ञान पर,
तो ग़फ़लत मुसल्लत हो इन्सान पर। (९)

सतोगुण का जिस वक्त बाला हो दस्त,
रजोगुण तमोगुण रहें इस से पस्त,
रजस से सतोगुण तमोगुण दबे,
तमस से सतोगुण रजोगुण घटें। (१०)

बदन है मकाँ और हवास उस के दर,
अगर दर है रोशन तो रोशन है घर। 
अगर ज्ञान का नूर हो जू-फ़िशां,
सतोगुण के ग़लबे का है यह निशाँ। (११)

रजोगुण का ग़लबा हो अर्जुन अगर,
तो हो जायें हिर्स-ओ हवा ज़ोर पर। 
तमन्ना हो कोशिश हो और पेच-ओ ताब,
रहे शौक-ए किरदार में इज़तराब। (१२)

तमोगुण जब इन्सां में हो ज़ोर पर,
तो हो मोह ग़ालिब कुरु के पिसर। 
अन्धेरा जहालत पे छा जायेगा,
जमूद  उस को ग़ाफ़िल बना जायेगा। (१३)

सतोगुण जो ग़ालिब हो इन्सान पर,
इसी हाल में मौत आये अगर। 
मकीं तन को पाये पवित्तर मुकाम,
वो सिद्धो की दुनिया में जाये मुदाम। (१४)

रजोगुण में इन्सां अगर जान दे,
जनम ऐहल-ए किरदार में आ के ले। 
तमोगुण में मर कर वो जिन्दों में आयें,
दरिंदो, परिंदों, चरिन्दों में आयें। (१५)

जो करता है इन्सां सतोगुण अमल,
तो पाता है पाकीजा और नेक फल। 
रजोगुण अमल से मिले पेच-ओ ताब,
तमोगुण अमल है जहालत का बाब। (१६)

सतोगुण से उरफ़ाँ का पैदा हो नूर,
रजोगुण से हिर्स-ओ हवा का ज़हूर। 
तमोगुण से धोखा भी गफ़लत भी हो,
तबीयत पे ग़ालिब जहालत भी हो। (१७)

सतोगुण से जायें सूयें आसमाँ,
रजोगुण से लटके रहें दरमियाँ। 
तमोगुण का गुण है जो सब से रज़ील,
यह पस्ती में डाले, यह कर दे ज़लील। (१८)

जो ऐहल-ए बसीरत हैं ऐहल-ए नज़र,
गुणों को समझते है जो कारगर।
मुझे मानते हैं गुणों से बुलन्द,
तो वासिल मुझी से हों वो अर्ज़मन्द। (१९)

बदन का है तीनों गुणों पर मदार,
मकीन-ए बदन गर करें उन को पार।
वो चखता है अमृत वो पाता है सुख,
न जीना न मरना न पीरी न दुःख। (२०)

अर्जुन उवाच ---
फिर अर्जुन ने पूछा कि ऐ किर्दगार !
वो इन्सां जो तीनों गुणों से हो पार।
चलन क्या है उस का इलामत क्या,
वो तीनों गुणों से हो क्योंकर रिहा ?। (२१)

श्रीभगवानुवाच ---
सुन अर्जुन सतोगुण से हासिल हो नूर,
रजोगुण से क़ुव्वत  तमस से फ़तूर।
है कामिल जिसे इन की चाहत नहीं,
जो हों तो उसे इन से नफ़रत नहीं। (२२)

जो इन्सां गुणों से रहे बे-ग़रज़,
न बेकल हो उन से न रक्खे ग़रज़।
जो समझे कि करते हैं गुण ही यह काम,
रहे पुरसकूँ खुद में कायम मुदाम। (२३)

जो सुख दुःख में यकसाँ जो है मुस्तकिल,
बराबर जिसे जऱ हो मिटटी कि सिल।
मुसावी पसन्दीदा-ओ ना-पसन्द,
हो तहसीं कि नफ़री वो  सब से बुलन्द। (२४)

न ज़िल्लत की परवाह न इज़्ज़त की भूख,
करे दोस्त दुश्मन से यकसाँ सलूक।
ग़रज़ त्याग दे मुझ पे सब कारोबार,
समझ लो गुणों से वो होता है पार। (२५)

जो ख़ादिम मेरा ही परस्तार है,
जो मेरी ही भक्ति में सरशार है।
हो तीनों गुणों से न क्यों पार वो,
है वस्ल-ए खुदा को सज़ावार वो। (२६)

मेरी जात ही ब्रह्मा का हैं मुकाम,
सबात-ओ बका का मुझी में कयाम।
मैं दीन-ए अज़ल का भी हूँ आसरा,
मेरी ज़ात-ए आली में राहत सदा। (२७)

(चौदहवाँ अध्याय समाप्त हुआ)


गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

श्रीमद भगवत गीता का तेरहवाँ अध्याय : क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग (हिंदी में व्याख्या)


ॐ श्रीपरमात्मने नमः 

क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग 
तेरहवाँ अध्याय 

जय श्रीकृष्ण मित्रों ! कल आपने तेरहवाँ अध्याय क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग के बारे में पढ़ा। आज उसकी हिंदी में व्याख्या हैं।  अब आगे ---

अर्जुन ने पूछा - हे केशव! मैं आपसे प्रकृति एवं पुरुष, क्षेत्र एवं क्षेत्रज्ञ और ज्ञान एवं ज्ञान के लक्ष्य के विषय में जानना चाहता हूँ। (१)

श्री भगवान ने कहा - हे कुन्तीपुत्र! यह शरीर ही क्षेत्र (कर्म-क्षेत्र) कहलाता है और जो इस क्षेत्र को जानने वाला है, वह क्षेत्रज्ञ (आत्मा) कहलाता है, ऎसा तत्व रूप से जानने वाले महापुरुषों द्वारा कहा गया हैं। (२)

हे भरतवंशी! तू इन सभी शरीर रूपी क्षेत्रों का ज्ञाता निश्चित रूप से मुझे ही समझ और इस शरीर तथा इसके ज्ञाता को जान लेना ही ज्ञान कहलाता है, ऐसा मेरा विचार है। (३)

यह शरीर रूपी कर्म-क्षेत्र जैसा भी है एवं जिन विकारों वाला है और जिस कारण से उत्पन्न होता है तथा वह जो इस क्षेत्र को जानने वाला है और जिस प्रभाव वाला है उसके बारे में संक्षिप्त रूप से मुझसे सुन। (४)

इस क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के बारे में ऋषियों द्वारा अनेक प्रकार से वैदिक ग्रंथो में वर्णन किया गया है एवं वेदों के मन्त्रों द्वारा भी अलग-अलग प्रकार से गाया गया है और इसे विशेष रूप से वेदान्त में नीति-पूर्ण वचनों द्वारा कार्य-कारण सहित भी प्रस्तुत किया गया है। (५)

हे अर्जुन! यह क्षेत्र पंच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश), अहंकार, बुद्धि, प्रकृति के अव्यक्त तीनों गुण (सत, रज, और तम), दस इन्द्रियाँ(कान, त्वचा, आँख, जीभ, नाक, हाथ, पैर, मुख, उपस्थ और गुदा), एक मन, पाँच इन्द्रियों के विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध)। इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, चेतना और धारणा वाला यह समूह ही विकारों वाला पिण्ड रूप शरीर है जिसके बारे में संक्षेप में कहा गया है। (६,७)

विनम्रता (मान-अपमान के भाव का न होना), दम्भहीनता (कर्तापन के भाव का न होना), अहिंसा (किसी को भी कष्ट नहीं पहुँचाने का भाव), क्षमाशीलता(सभी अपराधों के लिये क्षमा करने का भाव), सरलता (सत्य को न छिपाने का भाव), पवित्रता (मन और शरीर से शुद्ध रहने का भाव), गुरु-भक्ति (श्रद्धा सहित गुरु की सेवा करने का भाव), दृड़ता (संकल्प में स्थिर रहने का भाव) और आत्म-संयम (इन्द्रियों को वश में रखने का भाव)। (८)

इन्द्रिय-विषयों (शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श) के प्रति वैराग्य का भाव, मिथ्या अहंकार (शरीर को स्वरूप समझना) न करने का भाव, जन्म, मृत्यु, बुढा़पा, रोग, दुःख और अपनी बुराईयों का बार-बार चिन्तन करने का भाव। (९)

पुत्र, स्त्री, घर और अन्य भौतिक वस्तुओं के प्रति आसक्त न होने का भाव, शुभ और अशुभ की प्राप्ति पर भी निरन्तर एक समान रहने का भाव। (१०)

मेरे अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु को प्राप्त न करने का भाव, बिना विचलित हुए मेरी भक्ति में स्थिर रहने का भाव, शुद्ध एकान्त स्थान में रहने का भाव और सांसारिक भोगों में लिप्त मनुष्यों के प्रति आसक्ति के भाव का न होना। (११)

निरन्तर आत्म-स्वरूप में स्थित रहने का भाव और तत्व-स्वरूप परमात्मा से साक्षात्कार करने का भाव यह सब तो मेरे द्वारा ज्ञान कहा गया है और इनके अतिरिक्त जो भी है वह अज्ञान है। (१२)

हे अर्जुन! जो जानने योग्य है अब मैं उसके विषय में बतलाऊँगा जिसे जानकर मृत्यु को प्राप्त होने वाला मनुष्य अमृत-तत्व को प्राप्त होता है, जिसका जन्म कभी नही होता है जो कि मेरे अधीन रहने वाला है वह न तो कर्ता है और न ही कारण है, उसे परम-ब्रह्म (परमात्मा) कहा जाता है। (१३)

वह परमात्मा सभी ओर से हाथ-पाँव वाला है, वह सभी ओर से आँखें, सिर तथा मुख वाला है, वह सभी ओर सुनने वाला है और वही संसार में सभी वस्तुओं में व्याप्त होकर स्थित है। (१४)

वह परमात्मा समस्त इन्द्रियों का मूल स्रोत है, फिर भी वह सभी इन्द्रियों से परे स्थित रहता है वह सभी का पालन-कर्ता होते हुए भी अनासक्त भाव में स्थित रहता है और वही प्रकृति के गुणों (सत, रज, तम) से परे स्थित होकर भी समस्त गुणों का भोक्ता है। (१५)

वह परमात्मा चर-अचर सभी प्राणीयों के अन्दर और बाहर भी स्थित है, उसे अति-सूक्ष्म होने के कारण इन्द्रियों के द्वारा नही जाना जा सकता है, वह अत्यन्त दूर स्थित होने पर भी सभी प्राणीयों के अत्यन्त पास भी वही स्थित है। (१६)

वह परमात्मा सभी प्राणीयों में अलग-अलग स्थित होते हुए भी एक रूप में ही स्थित रहता है, यद्यपि वही समस्त प्राणीयों को ब्रह्मा-रूप से उत्पन्न करने वाला है, विष्णु-रूप से पालन करने वाला है और रुद्र-रूप से संहार करने वाला है। (१७)

वह परमात्मा सभी प्रकाशित होने वाली वस्तुओं के प्रकाश का मूल स्रोत होते हुए भी अन्धकार से परे स्थित रहता है, वही ज्ञान-स्वरूप (आत्मा) है, वही जानने योग्य (परमात्मा) है, वही ज्ञान स्वरूप (आत्मा) द्वारा प्राप्त करने वाला लक्ष्य है और वही सभी के हृदय में विशेष रूप से स्थित रहता है। (१८)

इस प्रकार कर्म-क्षेत्र (शरीर), ज्ञान-स्वरूप (आत्मा) और जानने योग्य(परमात्मा) के स्वरूप का संक्षेप में वर्णन किया गया है, मेरे भक्त ही यह सब जानकर मेरे स्वभाव को प्राप्त होते हैं। (१९)

हे अर्जुन! इस प्रकृति (भौतिक जड़ प्रकृति) एवं पुरुष (परमात्मा) इन दोनों को ही तू निश्चित रूप से अनादि समझ और राग-द्वेष आदि विकारों को प्रकृति के तीनों गुणों से उत्पन्न हुआ ही समझ। (२०)

जिसके द्वारा कार्य उत्पन्न किये जाते है और जिसके द्वारा कार्य सम्पन्न किये जाते है उसे ही भौतिक प्रकृति कहा जाता है, और जीव (प्राणी) सुख तथा दुःख के भोग का कारण कहा जाता है। (२१)

भौतिक प्रकृति में स्थित होने के कारण ही प्राणी, प्रकृति के तीनों गुणों से उत्पन्न पदार्थों को भोगता है और प्रकृति के गुणों की संगति के कारण ही जीव उत्तम और अधम योनियाँ में जन्म को प्राप्त होता रहता है। (२२)

सभी शरीरों का पालन-पोषण करने वाला परमेश्वर ही भौतिक प्रकृति का भोक्ता साक्षी-भाव में स्थित होकर अनुमति देने वाला है, जो कि इस शरीर में आत्मा के रूप में स्थित होकर परमात्मा कहलाता है। (२३)

जो मनुष्य इस प्रकार जीव को प्रकृति के गुणों के साथ ही जानता है वह वर्तमान में किसी भी परिस्थिति में स्थित होने पर भी सभी प्रकार से मुक्त रहता है और वह फिर से जन्म को प्राप्त नही होता है। (२४)

कुछ मनुष्य ध्यान-योग में स्थित होकर परमात्मा को अपने अन्दर हृदय में देखते हैं, कुछ मनुष्य वैदिक कर्मकाण्ड के अनुशीलन के द्वारा और अन्य मनुष्य निष्काम कर्म-योग द्वारा परमात्मा को प्राप्त होते हैं। (२५)

कुछ ऎसे भी मनुष्य हैं जो आध्यात्मिक ज्ञान को नहीं जानते है परन्तु वह अन्य महापुरुषों से परमात्मा के विषय सुनकर उपासना करने लगते हैं, परमात्मा के विषय में सुनने की इच्छा करने कारण वह मनुष्य भी मृत्यु रूपी संसार-सागर को निश्चित रूप से पार कर जाते हैं। (२६)

हे भरतवंशी अर्जुन! इस संसार में जो कुछ भी उत्पन्न होता है और जो भी चर-अचर प्राणी अस्तित्व में है, उन सबको तू क्षेत्र (जड़ प्रकृति) और क्षेत्रज्ञ (चेतन प्रकृति) के संयोग से ही उत्पन्न हुआ समझ। (२७)

जो मनुष्य समस्त नाशवान शरीरों में अविनाशी आत्मा के साथ अविनाशी परमात्मा को समान भाव से स्थित देखता है वही वास्तविक सत्य को यथार्थ रूप में देखता है। (२८)

जो मनुष्य सभी चर-अचर प्राणीयों में समान भाव से एक ही परमात्मा को समान रूप से स्थित देखता है वह अपने मन के द्वारा अपने आप को कभी नष्ट नहीं करता है, इस प्रकार वह मेरे परम-धाम को प्राप्त करता है। (२९)

जो मनुष्य समस्त कार्यों को सभी प्रकार से प्रकृति के द्वारा ही सम्पन्न होते हुए देखता है और आत्मा को अकर्ता देखता है, वही यथार्थ रूप से देखता है। (३०)

जब जो मनुष्य सभी प्राणीयों के अलग-अलग भावों में एक परमात्मा को ही स्थित देखता है और उस एक परमात्मा से ही समस्त प्राणीयों का विस्तार देखता है, तब वह परमात्मा को ही प्राप्त होता है। (३१)

हे कुन्तीपुत्र! यह अविनाशी आत्मा आदि-रहित और प्रकृति के गुणों से परे होने के कारण शरीर में स्थित होते हुए भी न तो कुछ करता है और न ही कर्म उससे लिप्त होते हैं। (३२)

जिस प्रकार सभी जगह व्याप्त आकाश अपनी सूक्ष्म प्रकृति के कारण किसी वस्तु से लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार शरीर में सभी जगह स्थित आत्मा भी शरीरों के कार्यों से कभी लिप्त नहीं होता है। (३३)

हे भरतवंशी अर्जुन! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार शरीर में स्थित एक ही आत्मा सम्पूर्ण शरीर को अपनी चेतना से प्रकाशित करता है। (३४)

जो मनुष्य इस प्रकार शरीर और शरीर के स्वामी के अन्तर को अपने ज्ञान नेत्रों से देखता है तो वह जीव प्रकृति से मुक्त होने की विधि को जानकर मेरे परम-धाम को प्राप्त होता हैं। (३५)



इस प्रकार उपनिषद, ब्रह्मविद्या तथा योगशास्त्र रूप श्रीमद् भगवद् गीता के श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद में क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग-योग नाम का तेरहवाँ अध्याय संपूर्ण हुआ ॥

॥ हरि: ॐ तत् सत् ॥



 भक्त और भगवान  की सुंदर कथा को अवश्य सुने

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

तेरहवाँ अध्याय : क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग


ॐ श्रीपरमात्मने नमः 

क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग 
तेरहवाँ अध्याय 

जय श्रीकृष्ण मित्रों ! बारहवें अध्याय के प्राम्भ में अर्जुन ने सगुण और निर्गुण के उपासकों की श्रेष्टता के विषय में प्रश्न किया था।  उसका उत्तर देते हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने दूसरे श्लोक में संक्षिप्त में सगुण उपासकों की श्रेष्ठता बताई और ३ से ५ श्लोक तक निर्गुण उपासना का स्वरूप उसका फल तथा उसकी किलष्टता बताई हैं।  उसके बाद भगवतभक्तो के लक्षणों का वर्णन करके अध्याय समाप्त किया लेकिन निर्गुण का तत्व, महिमा और उसकी प्राप्ति के साधन विस्तारपूर्वक नहीं समझाये थे, इसलिए निर्गुण (निराकार) का तत्व अर्थात ज्ञानयोग का विषय ठीक से समझाने के लिए इस तेरहवें अध्याय का आरंभ करते हैं।  अब आगे ---

श्रीभगवानुवाच ---
तुझे अब बताता हूँ कुन्ती के लाल,
कि यह जिस्म इक खेत की हैं मिसाल। 
है इस खेत का राज़ जिस पर इयाँ,
कहें क्षेत्रज्ञ इस को सब राजदाँ।  (१)

समझ खेत का राज-दाँ हूँ तो मैं,
कि हर खेत के दरमियाँ हूँ तो मैं। 
जो  यह खेत और क्षेत्रज्ञ का है इल्म,
मेरी राय में सब से आला है इल्म। (२)

सुन अर्जुन है क्या खेत क्या उस के गुन,
तग़ैय्युर हों कैसे कहा से यह सुन। 
है कौन और क्या कुव्वत-ए राज-दाँ,
मैं करता हूँ अब मुक्तसर सा बयाँ। (३)

यह ऋषियों ने गाया कई रंग से,
बहुत मीठे छन्दो के आहंग से। 
यह ब्रह्म-सूत्रों में भी मस्तूर है,
 यही बा-दलील इन में मज़कूर हैं। (४)

अनासर, अहंकार, अक़ल-ए मुहीत,
यह दिल दस हवास और यह फ़ितरत बसीत। 
यह आवाज़ मिस ज़ायका रङ्ग -ए बास,
करें जिन को महसूस पाँचों हवास। (५)

यह सुख-दुःख यह नफ़रत भी तरग़ीब भी,
ख़िरद-पायदारी भी तरकीब भी। 
ये हैं खेत और उन की तबदीलियाँ,
इन्हीं का है यह मुक्तसर-सा बयाँ। (६)

मैं करता हूँ अब ज्ञान गुन शुमार,
ये हैं रास्ती, हलम, अजू इन्कसार। 
अहिंसा भी और ख़िदमत-ए उस्ताद की,
दिली पुख़्तगी ज़ब्त पाकीज़गी। (७)

न होना सरोकार लज़्ज़ात से,
किनारा अहंकार की बात से। 
यही ग़ौर करना कि लें छीन सुख,
जन्म, मौत, पीरी, मरज़, दर्द, दुःख। (८)

न वाबस्तगी रिश्ता-ओ बन्द से,
न घर से, न ज़न से, न फ़रज़न्द से। 
तवाज़न से होना सकून-ओ करार,
गवारा हो सूरत कि हो ना-गवार। (९)

फ़कत धारणा मेरी भक्ति का योग,
दुई का न होना ज़रा दिल में रोग। 
अलग रह के महसूस करना सरूर,
हजूम-ए खलनायक से होना नफ़ूऱ। (१०)

ख़याल-अध्यात्म का शाम-ओ सहर,
हक़ीक़त के मकसद पे रखना नजर। 
यह इल्मों का है इल्म यह ज्ञान है,
ख़िलाफ़ इस के जो कुछ है अज्ञान है। (११)

सजवार-ए उरफाँ है वो पाक-ए जात,
कि है इल्म ही उस का आब-ए हयात। 
वो बे-इब्तदा लम-यजल जी-हशम,
न सत या असत कह सकें जिस को हम। (१२)

उसी के हैं सब दस्त-ओ पा चारसू,
उसी का है रुख रुनुमा चारसू। 
उसी की नज़र कान सर हर तरफ़,
मुहित-ए जहाँ सर-बसर हर तरफ़। (१३)

बजाहर नहीं गरचि उस के हवास,
दरखशां सफात-ए हवास उस के पास। 
वो है बे-तअल्लुक मगर सब का रब,
गुणों से बरी और गुण उस में सब। (१४)

किसी शै में जुम्बश किसी में सकूँ,
वो मौजूद सब में दरूँ और बरूँ। 
लतीफ़ ऐसा ऐहसास माज़ूर है,
वही है करीब और वही दूर है। (१५)

मुहाल उस की तकसीम ऐ-ज़ीशाऊर,
मगर उस का हर शै में हिस्सा जरूर। 
सज़ावार-ए उरफ़ाँ वो परवरदिगार,
फ़ना-ओ बका का उसी पर मदार। (१६)

वही ज़ात-ए नूर आला नूर है,
जो तारीकियों से बहुत दूर है। 
वो उरफ़ाँ का हासिल भी मकसूद भी,
वो उरफ़ाँ भी हर दिल में मौजूद भी। (१७)

तुझे मुख़्तसिर तौर पर कह दिया,
कि उरफ़ाँ-ओ मकसूद-ए उरफ़ाँ है क्या। 
बताया तुझे खेत का मैंने हाल,
जो समझे मेरा भक्त पाये वसाल। (१८)

यह माया अनादि है ला-इब्तदा,
इसी तरह ला-इब्तदा आत्मा। 
गुण अशिया के और उन की शकलें अनेक,
ये माया से जाहिर हुई एक-एक। (१९)

हवास-ओ बदन जो भी पैदा हुए,
यह माया के बाहिस हुएदा हुए। 
जो सुख-दुःख का होता है ऐहसास सब,
यह एहसास है आत्मा के सबब। (२०)

कि माया में जब आत्मा हो मकीं ,
गुणों से हो माया के लज़्ज़त गज़ी। 
गुणों से जो आलूदा हो बेश-ओ कम,
बुरी या भली जून में ले जनम। (२१)

महापुरुष तन में जो है जलवा-गर,
वो परमात्मा है महा-ईश्वर। 
वो नाज़र भी है, कार-फ़रमा भी है,
वो लज़्ज़त-गज़ी भी सहारा भी है। (२२)

अगर आत्मा को कोई जान ले,
गुणों और माया को पहचान ले। 
रहे जैसे चाहे वो जिस हाल में,
न आये तनासुख़ के जञ्जाल में। (२३)

कोई ध्यान से मन में डाले नजर,
तो देखे वो खुद आत्मा जलवा-गर। 
कोई सांख्य के योग से देख ले,
कोई देख ले योग से कर्म के। (२४)

मगर इन से हैं बे-ख़बर भी कई,
करें सुन-सुना कर जो पूजा मेरी। 
जो सुन लें उसी में वो सरशार हों,
फ़ना के समुन्दर से भी पार हों। (२५)

मिले खेत से खेत का राज-दाँ,
तो अर्जुन इसी से हो सब कुछ अयाँ। 
किसी में है जुम्बश, किसी में कयाम,
इसी मेल से पाये हस्ती तमाम। (२६)

जो है कुछ नज़र तो उसी की नज़र,
नज़र में रहे जिस की परमेश्वर। 
है सब जान वालों में जानी वही,
कि फ़ानी में है ग़ैर फ़ानी वही। (२७)

जो उस ज़ात-ए मुतलिक पे रक्खे यकीं ,
कि हर इक मकाँ में वही है मकीं। 
करे खुद न वो आत्मा को तबाह,
कि उत्तम गति की यह अच्छी है राह। (२८)

जो समझे कि दुनिया की सब रेल-पेल,
है माया का करतब, है माया का खेल। 
है ख़ुद आत्मा पुरसकूँ बे-अमल,
नज़र है उसी की नज़र बे-ख़लल। (२९)

जिसे आये कसरत में वाहदत नज़र,
कि हर रंग में है वही जलवा-गर। 
जो वाहदत से कसरत का समझे ज़हूर,
ख़ुदा से हो वासिल वही बिलजरूर। (३०)

मकीं तन के अन्दर है परमात्मा,
अनादि गुणों से बरी ला-फ़ना। 
अमल से वो फ़ारिग है कुन्ती के लाल,
अमल से न आलूदा हो ला-इज़ाल। (३१)

है आकाश दुनिया पे जैसे मुहीत,
मुजल्ला, मुसफ़्फ़ा कि है वो बसीत। 
बदन में यूहीं आत्मा है मकीं,
मगर इस से आलूदा होती नहीं। (३२)

हो सूरज से जिस तरह रोशन जहाँ,
चमक उठे भारत ज़मी-आसमाँ। 
इसी तरह खेतों पे छा जाये नूर,
जो हो खेत के राज़-दाँ का जहूर। (३३)

जो चश्म-ए-बसीरत से करता है ग़ौर,
कि खेत और है राज़-दाँ उस का और। 
जो माया से दे हस्तियों को निजात,
बुलन्दी हासिल करें वस्ल-ए ज़ात। (३४)


(तेरहवाँ अध्याय सम्पूर्ण हुआ)