सोमवार, 26 जून 2017

तुरंत शांति पाने के लिए पढ़े श्रीरामसुखदासजी के विचार (भाग-दूसरा)

ॐ गं गणपतये नमः 




जय श्रीकृष्ण मित्रों ! श्रीरामसुखदासजी के विचार जो तुरंत शांति प्रदान करते है, हमारे अंदर जब नकारात्मक विचार आते है और दुःख का समय हो तो ये विचार हमारे जीवन में शांति के साथ आध्यात्मिकता की ओर भी बढ़ाते है कल कुछ विचार पढ़े आज आगे बढ़ते है पढ़ते है अनमोल विचार : 


रविवार, 25 जून 2017

तुरंत शांति पाने के लिए पढ़े श्रीरामसुखदासजी के विचार (भाग-पहला)

ॐ गं गणपतये नमः 




जय श्रीकृष्ण मित्रों ! आज हम ऐसे विचारो से अवगत होगे जो महान संत के विचार है श्रीरामसुखदासजी के विचार जो तुरंत शांति प्रदान करते है, हमारे अंदर जब नकारात्मक विचार आते है और दुःख का समय हो तो ये विचार हमारे जीवन में शांति के साथ आध्यात्मिकता की ओर भी बढ़ाते है : 

विचार: पहला 

जैसे बिना चाहे सांसारिक दुःख प्राप्त होता है, इसी प्रकार बिना चाहे सांसारिक सुख भी प्राप्त होता है, अत: स्वयं सांसारिक सुख की इच्छा कभी नही करनी चाहिए l



वस्तु के न मिलने से हम अभागे नही हैं, बल्कि भगवान के अंश होकर भी हम नाशवान वस्तु की इच्छा करते हैं, यही हमारा वास्तविक अभागापन है l
भगवान जो कुछ करते हैं उसी में मेरा हित है, ऐसा विश्वास करके हर परिस्थिति में निश्चिन्त रहना चाहिए l
आप भगवान को नही देखते पर भगवान आपको निरंतर देख एहे हैं l
जब तक नाशवान वस्तुओं में सत्यता दिखेगी तब तक बोध नही होगा l
अभी जो धन प्राप्त हो रहा है वह वर्तमान कर्मो का फल नही अपितु प्रारब्ध (पूर्वजन्मो के कर्मो ) का फल है l वर्तमान में धन प्राप्ति के लिए जो बेईमानी की जाती है उसका फल तो आगे मिलेगा l
जैसे अपना दुःख दूर करने हेतु रूपये खर्च करते हैं वैसे ही दूसरों का दुःख दूर करने हेतु भी खर्च करो, अभी हमे रूपये रखने का अधिकार है l
मनुष्य का सम्मान एवं प्रतिष्ठा धन बढने से नही है, बल्कि धर्म बढने से है l
भगवान के नाम का जप और कीर्तन दोनों कलयुग से रक्षा करके उद्धार करने वाले हैं l
नाम जप में प्रगति होने की पहचान है, नाम जप छूटता ही नही l
नाम जप में रूचि नाम जप करने से ही होती है l
भगवान के नाम का जप सबके लिए है, और जीभ भी सबके मुख में होती है, परन्तु फिर भी कितने ही नरक में जाते हैं, आश्चर्य है l
भगवान का कौन सा नाम बढिया है, और भगवान का कौन सा रूप बढिया है, इसकी परीक्षा करने की बजाय अपनी परीक्षा करनी चाहिए, कि मुझे भगवान का कौन सा नाम और रूप अधिक प्रिय है l
दूसरों का बुरा करने से तो पाप लगता ही है, लेकिन दूसरों की बुराई कहने और सुनने में भी पाप लगता है l
भगवान से विमुख होना और संसार के सम्मुख होना, यही सबसे बड़ा पाप है l
किसी व्यक्ति को भगवान की और ले जाने के सामान कोई पुन्य नही है कोई दान नही है l 
पहले पाप कर लें फिर प्रायश्चित्त कर लेंगे ऐसे जान बूझ कर किये गए पाप प्रायश्चित्त से नष्ट नही होते
प्रत्येक मनुष्य को भगवान् की और चलना ही पड़ेगा, भले आज चले या अनेक जन्मो के बाद चले... तो फिर देरी क्यों ? 
संसार के कार्य में तो लाभ और हानि दोनों ही होते हैं, परन्तु भगवान के कार्य में लाभ ही लाभ होता है l
सांसार में असंतोष करने से पतन होता है और परमात्मा में असंतोष करने से उत्थान होता है l
प्रारब्ध का कार्य तो केवल सुख देने वाली या दुःख देने वाली परिस्थिति को उत्पन्न करना है, परन्तु उसमे सुखी या दुखी होना उसके चयन में मनुष्य स्वतंत्र है l
यह परमात्मा का विधान है कि अपने पाप से अधिक दंड कोई नही भोगता और जो दंड प्राप्त होता है वह अपने ही किसी न किसी पाप का फल होता है l 
संसार में प्रेम घटते ही परमात्मा में प्रेम हो जाता हि
भगवान के प्रति प्रेम होना, आकर्षण होना, खिंचाव होना ही भक्ति है l

विचार : दूसरा 

संसार बंधन से मुक्त होना चाहते हो तो जो वस्तुएं तुम्हें प्राप्त हैं उनकी ममता और जो वस्तुएं तुम्हें प्राप्त नही हैं उनकी कामना का त्याग करता l
शरीर संसार का अंश है, हम स्वयं परमात्मा के अंश हैं, इसलिए शरीर को संसार को अर्पित कर देना चाहिए अर्थात संसार की सेवा में लगा देना चाहिए, और स्वयं को परमात्मा को अर्पित कर दे, फिर आज ही मुक्ति है l
अनुकूलता - प्रतिकूलता ही संसार है, अनुकूलता - प्रतिकूलता में प्रसन्न और दुखी होने से मनुष्य बंध जाता है, तथा प्रसन्न और दुखी न होने से मुक्त हो जाता है l




अपने लिए सुख चाहने से नाशवान सुख प्राप्त होता है और दूसरों को सुख पहुंचाने से अविनाशी सुख प्राप्त होता है lसुख भोगने हेतु स्वर्ग है, तथा दुःख भोगने हेतु नरक है तथा सुख-दुःख से ऊँचे उठ कर महान आनन्द की प्राप्ति हेतु मनुष्य लोग है lजैसे रोगी का उद्देश्य निरोग होना है, इसी प्रकार मनुष्य जीवन का उद्देश्य अपना कल्याण करना है lइन्द्रियों द्वारा भोग तो पशु भी भोगते हैं, पर उन भोगों को भोगना मनुष्य जीवन का उद्देश्य नही l सुख –दुःख से रहित तत्व को प्राप्त करना मनुष्य जीवन का उद्देश्य है l वास्तव में परमात्मा प्राप्ति के सिवाय मनुष्य जीवन का अन्य कोई प्रयोजन नही, आवश्यक केवल इस प्रयोजन को पहचान कर इसे पूरा करने की है lजो आराम चाहता है वह अपनी वास्तविक उन्नति कभी नही कर सकता lशरीर, इन्द्रियां, मन, बुद्धि इनसे अपना संबंध न रखना ही सच्चा एकांत है l वर्तमान समय में घरों में एवं समान में जो अशांति देखने में आ रही है, उसका मूल कारण है कि लोग अपने अधिकार की मांग तो करते हैं परन्तु अपने कर्तव्यों का पालन नही करते lअपने हित हेतु किया गया कर्म ‘असत’ तथा दूसरों के हित के लिए किया गया कर्म ‘सत’ है, असत का परिणाम जन्म मरण और सत का परिणाम परमात्मा प्राप्ति है lसंसार के सभी संबंध अपने कर्तव्य का पालन करने हेतु हैं, न कि अधिकार जमाने हेतु, सुख देने के लिए है न कि सुख लेने के लिए lकल्याण की प्राप्ति अत्यंत सुगम एवं सरल है, परन्तु कल्याण की ईच्छा ही न हो तो फिर वह इच्छा सरलता किस काम की ?घर में रहने वाले सब लोग स्वयं को सेवक तथा दूसरों को सेव्य समझें, तो सबकी सेवा भी हो जाएगी और सबका कल्याण भी हो जायेगा l“मेरे मन की हो जाए” इसी को कामना कहते हैं... यह कामना ही दुःख का कारण है, अत: इसका त्याग किये बिना कोई सुखी नही हो सकता lजैसे जैसे कामनाएं नष्ट होती हैं, वैसे वैसे ही साधुता आती है, और जैसे जैसे कामनाएं बढती हैं वैसे वैसे साधुता लुप्त होती है, क्यूंकि (कारण) असाधुता का मूल कामना ही है lऐसा होना चाहिए, ऐसा नही होना चाहिए... इसी में सब दुःख भरे हुए हैं lयदि शान्ति चाहते हो तो कामनाओं का त्याग करो 





शुक्रवार, 23 जून 2017

कलियुग में नाम संकीर्तन की महिमा और भक्त ध्रुव के कथा

ॐ गं गणपतये नमः





कलियुग में इस महामंत्र का संकीर्तन करने मात्र से प्राणी मुक्ति के अधिकारी बन सकते हैं। कलियुग में भगवान की प्राप्ति का सबसे सरल किंतु प्रबल साधन उनका नाम-जप ही बताया गया है। श्रीमद्भागवत (१२.३.५१) का कथन है- यद्यपि कलियुग दोषों का भंडार है तथापि इसमें एक बहुत बडा सद्गुण यह है कि सतयुग में भगवान के ध्यान (तप) द्वारा, त्रेतायुगमें यज्ञ-अनुष्ठान के द्वारा, द्वापरयुगमें पूजा-अर्चना से जो फल मिलता था, कलियुग में वह पुण्यफलश्रीहरिके नाम-संकीर्तन मात्र से ही प्राप्त हो जाता है।

भक्तिचंद्रिका में महामंत्र का माहात्म्य इस प्रकार वर्णित है-बत्तीस अक्षरों वाला नाम- मंत्र सब पापों का नाशक है, सभी प्रकार की दुर्वासनाओंको जलाने के अग्नि-स्वरूप है, शुद्धसत्त्वस्वरूप भगवद्वृत्ति वाली बुद्धि को देने वाला है, सभी के लिए आराधनीय एवं जप करने योग्य है, सबकी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है। इस महामंत्र के संकीर्तन में सभी का अधिकार है। यह मंत्र प्राणिमात्र का बान्धव है, समस्त शक्तियों से सम्पन्न है, आधि-व्याधि का नाशक है। इस महामंत्र की दीक्षा में मुहूर्त्तके विचार की आवश्यकता नहीं है। इसके जप में बाह्यपूजा की अनिवार्यता नहीं है। केवल उच्चारण करने मात्र से यह सम्पूर्ण फल देता है। इस मंत्र के अनुष्ठान में देश-काल का कोई प्रतिबंध नहीं है।
विष्णुधर्मोत्तर में लिखा है कि श्रीहरि के नाम-संकीर्तन में देश-काल का नियम लागू नहीं होता है। जूठे मुंह अथवा किसी भी प्रकार की अशुद्ध अवस्था में भी नाम-जप को करने का निषेध नहीं है। श्रीमद्भागवत महापुराणका तो यहां तक कहना है कि जप-तप एवं पूजा-पाठ की त्रुटियां अथवा कमियां श्रीहरिके नाम- संकीर्तन से ठीक और परिपूर्ण हो जाती हैं। हरि-नाम का संकीर्त्तन ऊंची आवाज में करना चाहिए |

वह उसे समझाते हुए बोली-“वत्स! भले ही कोई तुम्हारा अपमान करें, किंतु तुम अपने मन में दूसरों के लिए अमंगल की इच्छा कभी मत करना। जो मनुष्य दूसरों को दुःख देता है, उसे स्वयं ही उसका फल भोगना पड़ता है। पुत्र! यदि तुम पिता की गोद में बैठना चाहते हो तो भगवान विष्णु की आराधना कर उन्हें प्रसन्न करो। उनकी कृपा से ही तुम्हारे पितामह स्वयंभू मनु को दुर्लभ लौकिक और अलौकिक सुख भोगने के बाद मोक्ष की प्राप्ति हुई थी। इसलिए पुत्र! तुम भी उनकी आराधना में लग जाओ। केवल वे ही तुम्हारे दुःखों को दूर कर सकते हैं।”
सुनीति की बात सुनकर ध्रुव के मन में श्रीविष्णु के प्रति भक्ति और श्रद्धा के भाव उत्पन्न हो गए। वह घर त्यागकर वन की ओर चल पड़ा। भगवान विष्णु की कृपा से वन में उसे देवर्षि नारद दिखाई दिए। उन्होंने ध्रुव को श्रीविष्णु की पूजा-आराधना की विधि बताई।मंत्र दिया ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। ध्रुव ने यमुना में स्नान किया और निराहार रहकर एकाग्र मन से श्रीविष्णु की आराधना करने लगा। पांच महीने बीतने के बाद वह पैर के एक अगूँठे पर स्थिर हो कर तपस्या करने लगा। 
ध्रुव भाव-विभोर होकर बोला-“भगवन! जब मेरी माता सुरुचि ने अपमानजनक शब्द कहकर मुझे पिता की गोद से उतार दिया था, तब माता सुनीति के कहने पर मैंने मन-ही-मन यह निश्चय किया था कि जो परब्रह्म भगवान श्रीविष्णु इस सम्पूर्ण जगत के पिता हैं, जिनके लिए सभी जीव एक समान हैं, अब मैं केवल उनकी गोद में बैठूँगा। इसलिए यदि आप प्रसन्न होकर मुझे वर देना चाहते हैं तो मुझे अपनी गोद में स्थान प्रदान करें, जिससे कि मुझे उस स्थान से कोई भी उतार न सके। मेरी केवल इतनी-सी अभिलाषा है।”
श्रीविष्णु बोले-“वत्स! तुमने केवल मेरा स्नेह प्राप्त करने के लिए इतना कठोर तप किया है। इसलिए तुम्हारी निःस्वार्थ भक्ति से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें ऐसा स्थान प्रदान करूँगा, जिसे आज तक कोई प्राप्त नहीं कर सका। यह ब्रह्मांड मेरा अंश और आकाश मेरी गोद है। मैं तुम्हें अपनी गोद में स्थान प्रदान करता हूँ। आज से तुम ध्रुव नामक तारे के रूप में स्थापित होकर ब्रह्मांड को प्रकाशमान करोगे।”
इसके आगे श्रीविष्णु ने कहा, “तुम्हारा पद सप्तर्षियों से भी बड़ा होगा और वे सदा तुम्हारी परिक्रमा करेंगे। जब तक यह ब्रह्मांड रहेगा, कोई भी तुम्हें इस स्थान से नहीं हटा सकेगा। वत्स! अब तुम घर लौट जाओ। कुछ समय के बाद तुम्हारे पिता  तुम्हें राज्य सौंपकर वन में चले जाएँगे। पृथ्वी पर छत्तीस हज़ार वर्षों तक धर्मपूर्वक राज्य भोगकर अंत में तुम मेरा मेरे पास आओगे।”




मंगलवार, 20 जून 2017

बंद किस्मत के दरवाजों को खोलती योगिनी एकादशी : जो रोगों और किस्मत के बंद दरवाजों को खोलती है


जय श्रीकृष्ण मित्रों ! आपने अब तक भगवान विष्णु के २४ अवतारों में २३ अवतारों का वर्णन विस्तार से  पढ़ा। आज योगिनी एकादशी है मित्रों चलिए आज इस पर थोड़ा प्रकाश डालते है : 





एकादशी का व्रत रखने वाले उपासक को अपना मन स्थिर एवं शांत रखना चाहिए। किसी भी प्रकार की द्वेष भावना या क्रोध मन में न लाएं। दूसरों की निंदा न करें। इस एकादशी पर श्री लक्ष्मी नारायण का पवित्र भाव से पूजन करना चाहिए। भूखे को अन्न तथा प्यासे को जल पिलाना चाहिए। एकादशी पर रात्रि जागरण का बड़ा महत्व है। रात में जागकर भगवान का भजन कीर्तन करें।  

योगिनी एकादशी का माहत्म्ये : 
युधिष्ठिर ने पूछा : वासुदेव ! आषाढ़ के कृष्णपक्ष में जो एकादशी होती हैउसका क्या नाम हैकृपया उसका वर्णन कीजिये ।
भगवान श्रीकृष्ण बोले : नृपश्रेष्ठ ! आषाढ़ (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार ज्येष्ठ ) के कृष्णपक्ष की एकादशी का नाम योगिनी’ है। यह बड़े बडे पातकों का नाश करनेवाली है। संसारसागर में डूबे हुए प्राणियों के लिए यह सनातन नौका के समान है ।
अलकापुरी के राजाधिराज कुबेर सदा भगवान शिव की भक्ति में तत्पर रहनेवाले हैं । उनका हेममाली नामक एक यक्ष सेवक थाजो पूजा के लिए फूल लाया करता था । हेममाली की पत्नी का नाम विशालाक्षी था । वह यक्ष कामपाश में आबद्ध होकर सदा अपनी पत्नी में आसक्त रहता था । एक दिन हेममाली मानसरोवर से फूल लाकर अपने घर में ही ठहर गया और पत्नी के प्रेमपाश में खोया रह गयाअत: कुबेर के भवन में न जा सका । इधर कुबेर मन्दिर में बैठकर शिव का पूजन कर रहे थे । उन्होंने दोपहर तक फूल आने की प्रतीक्षा की । जब पूजा का समय व्यतीत हो गया तो यक्षराज ने कुपित होकर सेवकों से कहा : यक्षों ! दुरात्मा हेममाली क्यों नहीं आ रहा है ?
यक्षों ने कहा: राजन् ! वह तो पत्नी की कामना में आसक्त हो घर में ही रमण कर रहा है । यह सुनकर कुबेर क्रोध से भर गये और तुरन्त ही हेममाली को बुलवाया । वह आकर कुबेर के सामने खड़ा हो गया । उसे देखकर कुबेर बोले : ओ पापी ! अरे दुष्ट ! ओ दुराचारी ! तूने भगवान की अवहेलना की हैअत: कोढ़ से युक्त और अपनी उस प्रियतमा से वियुक्त होकर इस स्थान से भ्रष्ट होकर अन्यत्र चला जा ।
कुबेर के ऐसा कहने पर वह उस स्थान से नीचे गिर गया । कोढ़ से सारा शरीर पीड़ित था परन्तु शिव पूजा के प्रभाव से उसकी स्मरणशक्ति लुप्त नहीं हुई । तदनन्तर वह पर्वतों में श्रेष्ठ मेरुगिरि के शिखर पर गया । वहाँ पर मुनिवर मार्कण्डेयजी का उसे दर्शन हुआ । पापकर्मा यक्ष ने मुनि के चरणों में प्रणाम किया । मुनिवर मार्कण्डेय ने उसे भय से काँपते देख कहा : तुझे कोढ़ के रोग ने कैसे दबा लिया ?
यक्ष बोला : मुने ! मैं कुबेर का अनुचर हेममाली हूँ । मैं प्रतिदिन मानसरोवर से फूल लाकर शिव पूजा के समय कुबेर को दिया करता था । एक दिन पत्नी सहवास के सुख में फँस जाने के कारण मुझे समय का ज्ञान ही नहीं रहाअत: राजाधिराज कुबेर ने कुपित होकर मुझे शाप दे दियाजिससे मैं कोढ़ से आक्रान्त होकर अपनी प्रियतमा से बिछुड़ गया । मुनिश्रेष्ठ ! संतों का चित्त स्वभावत: परोपकार में लगा रहता हैयह जानकर मुझ अपराधी को कर्त्तव्य का उपदेश दीजिये ।
मार्कण्डेयजी ने कहा: तुमने यहाँ सच्ची बात कही हैइसलिए मैं तुम्हें कल्याणप्रद व्रत का उपदेश करता हूँ । तुम आषाढ़ मास के कृष्णपक्ष की योगिनी एकादशी’ का व्रत करो । इस व्रत के पुण्य से तुम्हारा कोढ़ निश्चय ही दूर हो जायेगा ।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: राजन् ! मार्कण्डेयजी के उपदेश से उसने योगिनी एकादशी’ का व्रत कियाजिससे उसके शरीर को कोढ़ दूर हो गया । उस उत्तम व्रत का अनुष्ठान करने पर वह पूर्ण सुखी हो गया ।
नृपश्रेष्ठ ! यह योगिनी’ का व्रत ऐसा पुण्यशाली है कि अठ्ठासी हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने से जो फल मिलता हैवही फल योगिनी एकादशी’ का व्रत करनेवाले मनुष्य को मिलता है । योगिनी’ महान पापों को शान्त करनेवाली और महान पुण्य फल देनेवाली है । इस माहात्म्य को पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है ।

जय श्रीकृष्ण मित्रों ! कल मुलाकात होगी आप के अपने प्यारे विष्णुभगवान जी के २४ अवतार से जो कलयुग में जन्म लेगे।  आप इस तरह ही ब्लॉग पढ़ते रहिए।