ॐ गं गणपतये नमः
उर्दू के प्रसिद्ध शायर ख्वाजा दिल मोहम्मद जी ने भी सरल उर्दू पद में श्री गीता जी का श्लोकशः अनुवाद किया है। वंदनीय सदगुरुदेव "स्वामी श्रीगीतानंद जी महाराज" के आशीर्वाद से ये छोटा सा प्रयास है हमारी तरफ से गीता जी का उर्दू पद्यानुवाद पर प्रकाश डालने की कोशिश की गई है। आशा है कि ये गीता प्रेमियो में दिव्य रस का संचार करता हुआ उन्हें आध्यात्मिक मंज़िलो तक ले जाएगा।
सोमवार, 22 मई 2017
रविवार, 21 मई 2017
क्या? आप जानते है भगवान विष्णु के कितने अवतार हुए
ॐ गं गणपतये नमः
जय श्रीकृष्ण मित्रो ! वेद, उपनिषद, पुराणों और युगों के विषय में पढ़ा। आज आप को भगवान विष्णु के विषय में कुछ जानेगे। भगवान विष्णु के कुल २४ अवतार हुए है। जिन का वर्णन बहुत विस्तृत है। श्रीमद्धभगवतमहापुराण में भगवान विष्णु के सभी अवतारों का वर्णन किया गया है, मेरी यहाँ छोटी से कोशिश की है मित्रों आप को ये ब्लॉग जरूर पसंद आयेगा।
भगवान का वर्णन करने से पहले आप को
व्यासनंदन योगेश्वर श्रीशुकदेवजी के अनमोल शब्द की प्रभु कथा का रस म़त्युलोक (पृथ्वी) को छोडकर कही भी नहीं है (इसीलिए तो देवतागण भी म़त्युलोक में जन्म पाने के लिए लालायित रहते हैं ) ।
पृथ्वी के लोगों को इसलिए "भाग्यवान" की संज्ञा से संबोधित करते हुये श्रीशुकदेवजी ने कहा है कि प्रभु का गुणगान करने वाली प्रभु की कथा का खूब पान करो, शरीर में जब तक चेतना रहें तब तक बार बार पान करो । इसे कभी मत छोडो, मत छोडो ।
जीव हित, जीव कल्याण के लिए कितना प्रबल आग्रह करके हम पर अनुग्रह किया है आत्मज्ञान के महासागर व्यासनंदन श्रीशुकदेवजी ने ।
जब व्यासनंदन योगेश्वर श्रीशुकदेवजी श्रीमद भागवत महापुराण का महात्म्य बता रहे थे तभी श्रीहरि प्रभु अपने पार्षदों सहित प्रकट हुये थे । कथामृत के कारण ही सभी को प्रभु के दुर्लभ दर्शन हुये । सभी लोगों को बड़ा आनंद हुआ था और सभी का सारा मोह नष्ट हो गया था । तब व्यासनंदन श्रीशुकदेवजी ने सकल जगत के कल्याणार्थ देवी भक्ति को अपने पुत्रों ज्ञान और वैराग्य के साथ इस परम पुनीत महापुराण में सदैव के लिए स्थापित कर दिया । इसलिए श्रीमद भागवतजी के सेवन से हृदय में भक्ति के अंकूर फुटते हैं, आध्यात्म ज्ञान (सभी ज्ञानों में श्रेष्ठ) जाग्रत होता है, संसार के प्रति मोह हटकर वैराग्य भाव आता है । और इन सब के कारण हम सच्चे वैष्णव बन जाते हैं । प्रभु तो नित्य वैष्णवों के हृदय में ही वास करते हैं ।
इस तथ्य की पुष्टि एक अन्य प्रसंग में भी होती है । एक बार देवर्षि श्रीनारदजी ने प्रभु से पुछा था कि आपके मिलने का निश्चित स्थान (गोलोक, साकेत, क्षीरसागर में से) कौन सा है, तो प्रभु ने कहा था कि मैं भक्तों के हृदय में सदैव ही मिलता हूँ - वहाँ मेरा निश्चित वास है ।
भक्ति हमें सच्चा वैष्णव बना देती है । हमारे भीतर वैष्णव गुण भर देती है । यही वैष्णव गुण प्रभु को अत्यन्त प्रिय होते हैं । संत श्रीनरसी जी ने वैष्णवों का सबसे श्रेष्ठ चित्रण अपने अमर भजन "वैष्णव जन तो तेने कहिये" में किया है । महात्मा गांधीजी ( जिनके बारे में एक श्रद्धांजलि में कहा गया था कि आने वाली पीढी कदाचित ही यह विश्वास कर पायेगी की हाड-मांस का एक ऐसा महामानव कभी इस धरती पर चला होगा । ) जो एक सच्चे वैष्णव थे, उनका यह अति प्रिय भजन है । "वैष्णव जन तो तेने कहिये" में वर्णित वैष्णव गुणों पर एक नजर -
वैष्णव वह है -
(1) जो अभिमान रहित होकर परोपकार करे - (क) दुसरो के दुःख को जाने (ख) दुःखी का उपकार करे (ग) ऐसा करने पर भी मन में अभिमान का भाव नहीं लाये ,
(2) जो सकल लोक में किसी की भी निन्दा न करे ,
(3) जो अपने वचन और कर्म को निश्छल (छल रहित) रखे ,
(4) जो हर जीव और प्राणी को समदृष्टि भाव से देखे ,
(5) जो मन से तृष्णा (कामना) का त्याग करे ,
(6) जो माता के भाव से परस्त्री को देखे ,
(7) जो थकी जिह्वा से भी असत्य नहीं बोले ,
(8) जो पराये धन पर हाथ जाते ही, जिसके हाथ जलने एंव छाले पडने का भाव आये और हाथ छिटक जाये ,
(9) जो मोह और माया में अपने मन को नहीं व्यापने (फसने) दे ,
(10) जो दृढ वैराग्य अपने मन में रखे ,
(11) जो सिर्फ और सिर्फ राम नाम की ताली बजाये ( किसी सांसारिक नाम की ताली नहीं ) ,
(12) जो मन को लोभ और कपट से रहित रखे ,
(13) जो मन को काम और क्रोध से निवृत्त रखे ,
उपरोक्त आचरण रखने वाला -
(क) ऐसा पवित्र हो जाता है जैसे सकल तीर्थ उसके तन में आ बसे हो ,
(ख) कुटुम्ब में ऐसा एक भी प्राणी उस कुटुम्ब का पीढियों सहित उद्धार कर देता है ,
(ग) ऐसे आचरण युक्त वैष्णव अपने जन्म देने वाली जननी (माता) के कोख को धन्य धन्य कर देता है ।
भक्ति में ही इतनी प्रबल और प्रगाढ शक्ति होती है कि हमारे भीतर ऐसे स्वर्णिम वैष्णव गुण विकसित कर देती है जो प्रभु को अति प्रिय होते हैं ।
जय श्री कृष्ण मित्रों ! आज का ब्लॉग कैसा लगा आप को कमेंट में जरूर करना। रविवार की छुटटी का आनंद लीजिये।
शनिवार, 20 मई 2017
द्वापरयुग और कलियुग
ॐ गं गणपतये नमः
जय श्रीकृष्ण मित्रों ! आज द्वापर और कलियुग के विषय में बताना चाहूँगा।
द्वापरयुग
द्वापर युग भगवान श्रीकृष्ण की स्मृति एवं ज्ञान का युग था| इस युग में ही ‘गीता’ का दुर्लभ उपदेश भगवान श्रीकृष्ण ने दिया था| पूर्वांचल में द्वापर युग की भी स्मृति है| काशीराज परिवार से कौरव-पाण्डव का रिश्ता जग विख्यात है| यह युग 864 000 वर्षों का था, जिसमे एक प्रत्येक व्यक्ति 1000 साल तक जी सकता था, ऐसा माना जाता है जैसे- जैसे धरती पर पाप बढ़ेगा वैसे-वैसे इंसान की जीने की उम्र और उसकी इच्छा की पूर्ती कम होने लगेगी। हनुमान जी हा कहना था कि द्वापरयुग में लोग धर्म के मार्ग से भटकने लगेंगे और धरती पर पाप बढ़ने लगेगा।
जैसे कि आप सभी जानते हा इस युग में विष्णु जी ने खुद श्री कृष्णा का अवतार लेकर कंस को मौत के घाट उतारा था।
कलियुग
ऐसा माना जाता है कि कलयुग में एक आत्मा का जन्म 45 बार होता है और उसकी उम्र 100 साल तक की होगी । इस युग में इंसान पर्यावरण को तहस नहस कर देगा, और इस युग में इंसान की इच्छा पूर्ती कम हो जाएगी और वे पाप का भागीदार बन जाएगा। कलियुग के अंतिम काल में भगवान विष्णु का कल्कि अवतार होगा। यह अवतार विष्णुयशा नामक ब्राह्मण के घर जन्म लेगा। भगवान कल्कि बहुत ऊंचे घोड़े पर चढ़कर अपनी विशाल तलवार से सभी अधर्मियों का नाश करेंगे। भगवान कल्कि केवल तीन दिनों में पृथ्वी से समस्त अधर्मियों का नाश कर देंगे। माना जाता है कि कलियुग में अंतिम समय में बहुत मोटी धारा से लगातार वर्षा होगी, जिससे चारों ओर पानी ही पानी हो जाएगा। समस्त पृथ्वी पर जल हो जाएगा और प्राणियों का अंत हो जाएगा। इसके बाद एक साथ बारह सूर्य उदय होंगे और उनके तेज से पृथ्वी सूख जाएगी।कलियुग में इतनी बुराई होते हुए भी हरि नाम संकीर्तन का महत्व भी उतना ही है इस का वर्णन मैं पहले के ब्लॉग में कर चुका हूँ। चलिए मित्रों कल मुलाकात होगी। आप कमेंट करना ना भूले। आप का दिन मंगलमय हो। जय श्रीकृष्ण मित्रों !
गुरुवार, 18 मई 2017
भारतीय (भारत की) संस्कृति
ॐ गं गणपतये नमः भारतीय (भारत की) संस्कृति
भारतीय (भारत की) संस्कृति
जय श्री कृष्ण मित्रों ! आप ने अब तक पुराणों, वेद, उपनिषद से सम्बन्धित पढ़ा, ये छोटी से कोशिश थी जबकि ये अथाह समुद्र है। कितने वेद पुराण काल के गर्त में खो गए। भारत में विदेशियों के आक्रमणों के कारण भी इन को नष्ट कर दिया गया। हम अपनी संस्कृति को धीरे धीरे भूलते जा रहे है। चलिए आज संस्कृति से सम्बंधित कुछ जानकारी देना चाहूंगा आप को :
भारत की संस्कृति
चार युग - सतयुग , त्रेता युग , द्वापरयुग एवं कलयुग।
दो पक्ष - कृष्ण पक्ष एवं शुक्ल पक्ष।
तीन ऋण - देव ऋण, पित्र ऋण एवं ऋषि त्रण।
चार धाम - द्वारिका , बद्रीनाथ, जगन्नाथ पूरी एवं रामेश्वरम धाम।
चारपीठ - शारदा पीठ ( द्वारिका ), ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम), गोवर्धनपीठ ( जगन्नाथपुरी ) एवं श्रन्गेरिपीठ
चार वेद- ऋग्वेद , अथर्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद।
चार आश्रम - ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , बानप्रस्थ एवं संन्यास।
चार अंतःकरण - मन , बुद्धि , चित्त , एवं अहंकार।
पञ्च गव्य - गाय का घी , दूध, दही , गोमूत्र एवं गोबर।
पञ्च देव - गणेश , विष्णु , शिव , देवी और सूर्य।
पंच तत्त्व - प्रथ्वी , जल , अग्नि , वायु एवं आकाश।
छह दर्शन - वैशेषिक , न्याय, सांख्य, योग , पूर्व मिसांसा एवं दक्षिण मिसांसा।
सप्त ऋषि - विश्वामित्र , जमदाग्नि , भरद्वाज , गौतम , अत्री , वशिष्ठ और कश्यप।
सप्त पूरी - अयोध्या पूरी , मथुरा पूरी , माया पूरी ( हरिद्वार ) , कशी , कांची ( शिन कांची - विष्णु कांची ), अवंतिका और द्वारिका पूरी।
आठ योग - यम , नियम, आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान एवं समाधी।
आठ लक्ष्मी - आग्घ , विद्या, सौभाग्य , अमृत , काम , सत्य, भोग , एवं योग लक्ष्मी।
नव दुर्गा - शैल पुत्री , ब्रह्मचारिणी , चंद्रघंटा ,कुष्मांडा , स्कंदमाता , कात्यायिनी , कालरात्रि , महागौरी एवं सिद्धिदात्री।
दस दिशाएं - पूर्व , पश्चिम, उत्तर , दक्षिण , इशान , नेत्रत्य , वायव्य आग्नेय,आकाश एवं पाताल।
मुख्या ग्यारह अवतार - मत्स्य , कच्छप , बराह , नरसिंह , बामन , परशुराम , श्री राम , कृष्ण , बलराम , बुद्ध , एवं कल्कि।
बारह मास - चेत्र , वैशाख , ज्येष्ठ ,अषाड़ , श्रावन , भाद्रपद , अश्विन , कार्तिक, मार्गशीर्ष . पौष , माघ , फागुन।
बारह राशि - मेष , ब्रषभ , मिथुन , कर्क , सिंह , तुला , ब्रश्चिक , धनु , मकर , कुम्भ, एवं कन्या।
बारह ज्योतिर्लिंग - सोमनाथ , मल्लिकर्जुना , महाकाल , ओमकालेश्वर , बैजनाथ , रामेश्वरम , विश्वनाथ , त्रियम्वाकेश्वर , केदारनाथ , घुष्नेश्वर , भीमाशंकर एवं नागेश्वर।
पंद्रह तिथियाँ - प्रतिपदा, द्वतीय , तृतीय , चतुर्थी , पंचमी , षष्ठी , सप्तमी , अष्टमी , नवमी , दशमी , एकादशी , द्वादशी , त्रयोदशी , चतुर्दशी , पूर्णिमा , अमावस्या
स्म्रतियां - मनु , विष्णु, अत्री , हारीत , याज्ञवल्क्य , उशना , अंगीरा , यम , आपस्तम्ब , सर्वत , कात्यायन, बृहस्पति , पराशर , व्यास , शांख्य , लिखित , दक्ष , शातातप , वशिष्ठ।
चलिए मित्रों थोड़ा और आगे चले : महर्षि व्यास जी के अनुसार सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलयुग ये चार युग हैं, जो देवताओ के बारह हज़ार दिव्य वर्षो के बराबर होते हैंI समस्त चतुर्युग एक से ही होते हैंI आरम्भ सत्ययुग से होता है अंत में कलयुग होता हैI किसी भी जन्म में अपनी आज़ादी से किये गये कर्मों के मुताबिक आत्मा अगला शरीर धारण करती है। हिन्दू धर्म के सर्वोच्च ग्रन्थ हैं, जो पूर्णत: अपरिवर्तनीय हैं, अर्थात् किसी भी युग में इनमे कोई बदलाव नही किया जा सकता। ब्रह्माजी क्रत्युग में जिस प्रकार सृष्टि का आरम्भ करते हैं, वैसे ही कलयुग में उसका उपसंहार करते हैंI सतयुग, द्वापरयुग, कलयुग हर युग में कोई न कोई भगवन जन्म जरूर लेते है ऐसा सभी लोगों का मानना है, लेकिन क्या आप जानते है कि किस युग में इंसान कितने जन्म लेता है। इसलिए आइए जानें चारों युगों के बारे में कुछ ऐसी बातें जो कभी नहीं सुना होगा। मित्रों इस विषय में कल बात होगी। इसलिए पढ़ना न भूले।
चारपीठ - शारदा पीठ ( द्वारिका ), ज्योतिष पीठ ( जोशीमठ बद्रिधाम), गोवर्धनपीठ ( जगन्नाथपुरी ) एवं श्रन्गेरिपीठ
चार वेद- ऋग्वेद , अथर्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद।
चार आश्रम - ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , बानप्रस्थ एवं संन्यास।
चार अंतःकरण - मन , बुद्धि , चित्त , एवं अहंकार।
पञ्च गव्य - गाय का घी , दूध, दही , गोमूत्र एवं गोबर।
पञ्च देव - गणेश , विष्णु , शिव , देवी और सूर्य।
पंच तत्त्व - प्रथ्वी , जल , अग्नि , वायु एवं आकाश।
छह दर्शन - वैशेषिक , न्याय, सांख्य, योग , पूर्व मिसांसा एवं दक्षिण मिसांसा।
सप्त ऋषि - विश्वामित्र , जमदाग्नि , भरद्वाज , गौतम , अत्री , वशिष्ठ और कश्यप।
आठ योग - यम , नियम, आसन , प्राणायाम , प्रत्याहार , धारणा , ध्यान एवं समाधी।
आठ लक्ष्मी - आग्घ , विद्या, सौभाग्य , अमृत , काम , सत्य, भोग , एवं योग लक्ष्मी।
नव दुर्गा - शैल पुत्री , ब्रह्मचारिणी , चंद्रघंटा ,कुष्मांडा , स्कंदमाता , कात्यायिनी , कालरात्रि , महागौरी एवं सिद्धिदात्री।
दस दिशाएं - पूर्व , पश्चिम, उत्तर , दक्षिण , इशान , नेत्रत्य , वायव्य आग्नेय,आकाश एवं पाताल।
मुख्या ग्यारह अवतार - मत्स्य , कच्छप , बराह , नरसिंह , बामन , परशुराम , श्री राम , कृष्ण , बलराम , बुद्ध , एवं कल्कि।
बारह मास - चेत्र , वैशाख , ज्येष्ठ ,अषाड़ , श्रावन , भाद्रपद , अश्विन , कार्तिक, मार्गशीर्ष . पौष , माघ , फागुन।
बारह राशि - मेष , ब्रषभ , मिथुन , कर्क , सिंह , तुला , ब्रश्चिक , धनु , मकर , कुम्भ, एवं कन्या।
बारह ज्योतिर्लिंग - सोमनाथ , मल्लिकर्जुना , महाकाल , ओमकालेश्वर , बैजनाथ , रामेश्वरम , विश्वनाथ , त्रियम्वाकेश्वर , केदारनाथ , घुष्नेश्वर , भीमाशंकर एवं नागेश्वर।
पंद्रह तिथियाँ - प्रतिपदा, द्वतीय , तृतीय , चतुर्थी , पंचमी , षष्ठी , सप्तमी , अष्टमी , नवमी , दशमी , एकादशी , द्वादशी , त्रयोदशी , चतुर्दशी , पूर्णिमा , अमावस्या
स्म्रतियां - मनु , विष्णु, अत्री , हारीत , याज्ञवल्क्य , उशना , अंगीरा , यम , आपस्तम्ब , सर्वत , कात्यायन, बृहस्पति , पराशर , व्यास , शांख्य , लिखित , दक्ष , शातातप , वशिष्ठ।
बुधवार, 17 मई 2017
उपनिषद् : सूक्तियाँ
ॐ गं गणपतये नमः
उपनिषद् : सूक्तियाँ
उपनिषद् : सूक्तियाँ
उपनिषद् : सूक्तियाँ
जय श्रीकृष्ण मित्रों ! कल आप ने वेदों के विषय में पढ़ा। आज मित्रों उपनिषद की विषय में छोटी से कोशिश है।
वेद के चार भाग हैं –
संहिता -संहिता में वैदिक देवी देवताओं की स्तुति के मंत्र हैं |
ब्राह्मण- ब्राह्मण में वैदिक कर्मकाण्ड और यज्ञों का वर्णन है |
आरण्यक- आरण्यक में कर्मकाण्ड और यज्ञों की रूपक कथाएँ और तत् सम्बन्धी दार्शनिक व्याख्याएँ हैं |
उपनिषद् (वेदान्त )- उपनिषद् में वास्तविक वैदिक दर्शन का सार है।
उपनिषद् हिन्दू धर्म के धर्मग्रन्थ हैं। इनमें परमेश्वर, परमात्मा-ब्रह् म और आत्मा के स्वभाव और सम्बन्ध का वर्णन दिया गया है।
उपनिषदों में कर्मकांड को 'अवर' कहकर ज्ञान को इसलिए महत्व दिया गया कि ज्ञान स्थूल से सूक्ष्म की ओर ले जाता है।
ब्रह्म, जीव और जगत् का ज्ञान पाना उपनिषदों की मूल शिक्षा है।
भगवद्गीता तथा ब्रह्मसूत्र उपनि षदों के साथ मिलकर वेदान्तकी 'प्रस्थानत्रयी' कहलाते हैं।
ये संस्कृत में लिखे गये हैं।
17 वी सदी में दारा शिकोह ने अनेक उपनिषदों का फारसी में अनुवाद कराया।
19 वीं सदी में जर्मन तत्त्ववेता शोपेनहावर और मैक् समूलर ने इन ग्रन्थों का अनुवाद किए।
उपनिषद् में आत्म और अनात्म तत्त्वों का निरूपण किया गया है जो वेद के मौलिक रहस्यों का प्रतिपादन करता है। प्राय: उपनिषद् वेद के अन्त में ही आते हैं। इसलिए ये वेदान्त के नाम से भी प्रख्यात हैं। वैदिक धर्म के मौलिक सिद्धान्तों को तीन प्रमुख ग्रन्थ प्रमाणित करते हैं जो प्रस्थानत्रयी के नाम से विख्यात हैं, ये हैं
उपनिषद्
ब्रह्मसूत्र
श्रीमद्भगवद्गीता
108 उपनिषद एवं उनका वर्गीकरण निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित किया जाता है-
1 ऋग्वेदीय 10 उपनिषद्
2 शुक्ल यजुर्वेदीय 19 उपनिषद्
3 कृष्ण यजुर्वेदीय 32 उपनिषद्
4 सामवेदीय 16 उपनिषद्
5 अथर्ववेदीय 31 उपनिषद्
इनके अतिरिक्त नारायण, नृसिंह, रामतापनी तथा गोपाल चार उपनिषद् और हैं।
जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने 10 पर अपना भाष्य दिया है-
(1) ईश, (2) ऐतरेय (3) कठ (4) केन (5) छांदोग्य (6) प्रश्न (7) तैत्तिरीय (8) बृहदारण्यक (9) मांडूक्य और (10) मुंडक।
उन्होने निम्न तीन को प्रमाण कोटि में रखा है-
(1) श्वेताश्वतर (2) कौषीतकि तथा (3) मैत्रायणी।
भाषा तथा उपनिषदों के विकास क्रम की दृष्टि से डॉ॰ डासन ने उनका विभाजन चार स्तर में किया है:
प्राचीनतम
1. ईश, 2. ऐतरेय, 3. छांदोग्य, 4. प्रश्न, 5. तैत्तिरीय, 6. बृहदारण्यक, 7. मांडूक्य और 8. मुंडक
प्राचीन
1. कठ, 2. केन
अवांतरकालीन
1. कौषीतकि, 2. मैत्री (मैत्राणयी) 3. श्वेताश्वतर
उपनिषदों का अभिमत ही आगे चलकर वेदांत का सिद्धांत और संप्रदायों का आधार बन गया। उपनिषदों की शैली सरल और गंभीर है। अनुभव के गंभीर तत्व अत्यंत सरल भाषा में उपनिषदों में व्यक्त हुए हैं। उनको समझने के लिए अनुभव का प्रकाश अपेक्षित है। ब्रह्म का अनुभव ही उपनिषदों का लक्ष्य है। वह अपनी साधना से ही प्राप्त होता है। गुरु का संपर्क उसमें अधिक सहायक होता है। तप, आचार आदि साधना की भूमिका बनाते हैं। कर्म आत्मिक अनुभव का साधक नहीं है। कर्म प्रधान वैदिक धर्म से उपनिषदों का यह मतभेद है।
सन्यास, वैराग्य, योग, तप, त्याग आदि को उपनिषदों में बहुत महत्व दिया गया है। इनमें श्रमण परंपरा के कठोर सन्यास वाद की प्रेरणा का स्रोत दिखाई देता है। गीता का कर्म योग उपनिषदों की आध्यात्मिक भूमि में ही अंकुरित हुए हैं।
मीमांसा :- कर्म कांड और वेदांत वेद की 2 शाखाएँ हैं। संहिता और ब्राह्मण में कर्म कांड का प्रतिपादन किया गया है तथा उपनिषद् एवं आरण्यक में ज्ञान का। मीमांसा दर्शन के आद्याचार्य जैमिनि ने इस कर्मकाण्ड को सिद्धांत बद्ध किया है। प्रतिपादित कर्मों के द्वारा ही मनुष्य अभीष्ट प्राप्त कर सकता है।
कर्म तीन प्रकार के हैं :- काम्य, निषिद्ध और नित्य। बिना कर्म के ईश्वर भी फल देने में समर्थ नहीं है। मीमांसा दर्शन ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करते हुए बहुदेववादी है। सभी कर्मों के परिणाम विधाता तय करता है जो मनुष्य को शुभ और अशुभ फल उसके जन्म-जन्मांतरों के कर्मों के अनुरूप प्रारब्ध के रूप में प्रकट करता है। पूर्व अर्जित कर्म ही शुभ-अशुभ, रोग-वैराग आदि के रूप में प्रकट होते है और फल के उपरांत नष्ट हो जाते हैं।
मनुष्य सृष्टि नियम के अनुसार जन्म व मरण के चक्र में फंसा हुआ है। सत्कर्मों, ज्ञान व उपासना अर्थात् ईश्वर के साक्षात्कार से मनुष्य का जीवात्मा जन्म व मृत्यु के चक्र से छूट कर मुक्ति की अवस्था में चला जाता है। मुक्ति की अवधि एक परान्तरकाल जो 31 नील 10 खरब 40 अरब वर्षों की होती है। इस लम्बी अवधि में मुक्त जीवात्मा जन्म मरण के चक्र से छूटा हुआ ईश्वर के सान्निध्य वा मुक्ति में आनन्द के साथ रहता है। मुक्ति से सम्बन्धित कुछ उपनिषदों की सूक्तियां स्वाध्याय हेतु हम प्रस्तुत कर रहे हैं। आशा है कि पाठक इन्हें पसन्द करेंगे।
उपनिषदों की मोक्ष विषयक कुछ सूक्तियां इस प्रकार हैं।
(1) तमीशानं वरदं देवमीड्यम्, निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति। (श्वेता. 4/11)
अर्थः उस सर्वोपरि, मनोवांछित वरो के प्रदाता, ज्योतिस्वरूप, उपास्यदेव ईश्वर को निश्चय पूर्वक जानकर ही उपासक मनुष्य वा योगी इस अत्यन्त शान्ति से पूर्ण मुक्त अवस्था को प्राप्त करता है।
(2) विद्ययाऽमृतमश्नुते। (ईशोपनिषद 11)
अर्थः जीव, विद्या (ज्ञान) से अमृत (मोक्ष) को प्राप्त करता है।
(3) अमृतस्य देवधारणो भूयासम्। (तै. शि. 4/1)
अर्थः मैं मुक्ति रूपी सुख का विद्वानों के तुल्य धारण करनेवाला होऊं।
(4) ब्रह्मस्थोऽमृतत्वमेति। (छान्दोग्य उपनिषद 2/23/1)
अर्थः ब्रह्म में लीन भक्त अमृत (मुक्ति) को पा लेता है।
(5) अमृतत्वस्य तु नाशाऽस्ति वित्तेनेति। (बृहदारण्यक उपनिषद 2/4/2)
अर्थः अमृतत्व-परम शान्ति (मोक्ष) की आशा धन से नहीं करनी चाहिए।
(6) स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्ते। (कठोपनिषद 1/3)
अर्थः स्वर्ग लोक वाले (मुक्ति को प्राप्त जीव) अमृतपन (आनन्द) का सेवन करते हैं।
(7) न साम्परायः प्रतिभाति बालम्। (कठोपनिषद 2/6)
अर्थः अज्ञ (अज्ञानी), अबोध मनुष्य को मोक्ष अच्छा नहीं लगता।
(8) धीराः अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते। (कठोपनिषद 4/2)
अर्थः ध्यानी जन अमृतत्व को जान कर इन अनित्य (सांसारिक) पदार्थों में नित्य (परमात्मा) को नहीं चाहते।
(9) तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतेरषाम्। (कठोपनिषद 5/12)
अर्थः जो धीर पुरूष उसे आत्मस्थ देखते हैं, उन्हें ही स्थिर सुख (मोक्ष) प्राप्त होता है, दूसरों को नहीं।
(10) पृथगात्मानं प्रेरितारं च मत्वा, जुष्टस्ततस्तेनामृतत्वमेति। (श्वेता. उपनिषद 1/7)
अर्थः अपने आपको (अपनी जीवात्मा को) और इस सृष्टि के प्रेरक परमात्मा को पृथक्-पृथक् जानकर, उस परमेश्वर की स्तुति करने-वाला, प्रभु का प्रेमी उपासक, उसकी कृपा से मोक्ष को प्राप्त करता है।
जय श्री कृष्ण मित्रो ! कल मुलाकात होगी !
मंगलवार, 16 मई 2017
वेद: संख्या और महत्व
ॐ गं गणपतये नमः

वेद: संख्या और महत्व
वेद: संख्या और महत्व
जय श्रीकृष्ण मित्रों ! आज आप से वेदों के विषय में बात करते है ये कितने है और इन का क्या महत्व है। चलिए पहले इस की संख्या पर प्रकाश डाले।
वेदों की संख्या:
सभी जानते हैं की वेदों की संख्या चार है, लेकिन यह बात बहुत कम लोग जानते हैं की शुरुआत में वेद केवल एक ही था, अध्ययन की सुविधा की द्रष्टि से उसे चार भागों में बाँट दिया गया। एक और मत इस संबंध में प्रचलित है जिसके अनुसार, अग्नि, वायु और सूर्य ने तपस्या करी और ऋग्वेद, आयुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद को प्राप्त किया। ऋग्वेद, आयुर्वेद और सामवेद को क्रमशः अग्नि, वायु और सूर्य से जोड़ा गया है। इसको आगे स्पष्ट करते हुए बताया गया है की अग्नि से अंधकार दूर होता है और प्रकाश मिलता है इसी प्रकार वेदों से अज्ञान का अंधेरा छंट कर ज्ञान का प्रकाश होता है। वायु का काम चलना है जिसका वेदों में अर्थ कर्म करने से जोड़ा गया है। इसी प्रकार सूर्य अपने तेज और प्रताप के कारण पूजनीय है यही वेदों में भी स्पष्ट किया गया है।
वेदों के प्रकार
वेद चार प्रकार के हैं और इनकी विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
1. ऋग्वेद:
वेदों में सबसे पहला वेद ऋग्वेद कहलाता है। इस वेद में ज्ञान प्राप्ति के लिए लगभग 10 हज़ार मंत्रों को शामिल किया गया है जिनमें पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति, देवताओं के आवाहन के मंत्र आदि लिखे गए हैं। ये सभी मंत्र कविता और छंद के रूप में लिखे गए हैं। इसे विश्व का सबसे प्राचीन ग्रंथ माना गया है।
2. यजुर्वेद
इस वेद में समर्पण की प्रक्रिया के लिए लगभग 40 अध्यायों में 3750 गद्यात्मक मंत्र हैं। ये मंत्र यज्ञ की विधियाँ और यज्ञ में प्रयोग किए जाने वाले मंत्र हैं। यज्ञ के अलावा तत्व ज्ञान का वर्णन भी इस वेद में है। इस वेद की दो शाखाएँ -शुक्ल और कृष्ण हैं।
3. सामवेद
साम का अर्थ है रूपान्तरण, संगीत, सौम्यता, और उपासना। इस वेद में ऋग्वेद की ऋचाओं का संगीतमय रूप है। इसमें संगीत की उपासना है जिसमें 1875 मंत्र हैं।
4. अथर्ववेद:
वेदों की श्रृंखला में सबसे आखिरी वेद है । इसमें गुण, धर्म, आरोग्य के साथ यज्ञ के लिए कवितामय मंत्र जिनकी संख्या 7260 हैं जो लगभग 20 अध्यायों में हैं , शामिल हैं। इसमें रहस्यमय विध्याओं के जैसे जादू, चमत्कार आदि के भी मंत्र हैं।
अब बात करते है वेदों के महत्व की : वेद में कौन-कौन से विज्ञान भरे हुए हैं?
वेद पितर, देव और मनुष्य सबके लिए सनातन मार्गदर्शक नेत्र के समान है। वेद की महिमा का पूर्णरूपेण प्रतिपादन करना अथवा उसे पूर्णतया समझना अत्यन्त कठिन है। चारों वर्ण, तीन लोक, चार आश्रम, भूत, भविष्यत् और वर्त्तमान विषयक ज्ञान वेद से ही प्रसिद्ध होता है। यह सनातन (नित्य) वेदशास्त्र ही सब प्राणियों का धारण और पोषण करता है, इसलिए मैं इसे मनुष्यों के लिए भवसागर से पार होने के लिए परम साधन मानता हूँ।
(मनु. १२.९४.९७.९९)
मनुजी ने तो यहाँ तक लिखा है-तप करना हो तो ब्राह्मण सदा वेद का ही अभ्यास करे, वेदाभ्यास ही ब्राह्मण का परम तप है।
(मनु0 २.१६६)
‘जो वेदाध्ययन और यज्ञ न करके मुक्ति पाने की इच्छा करता है, वह नरक (दुःखविशेष) को प्राप्त होता है।’
(मनु0 ६.३७)
‘क्रम से चारों वेदों का, तीन वेदों का, दो वेदों का अथवा एक वेद का अध्ययन करके, अखण्ड ब्रह्मचारी रहकर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना चाहिए।’
(मनु0 ३.२)
आज यदि महर्षि मनु का विधान लागू हो जाए तो सारे विवाह अयोग्य, अनुचित (unfit) हो जाएँ। महर्षि मनु ईश्वर को न माननेवाले को नास्तिक नहीं कहते, अपितु वेदनिन्दक को नास्तिक की उपाधि से विभूषित करते हैं।….
वैशेषिकदर्शन में कहा है-
तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्।।
-वै0 १0-१.३
अर्थात् ईश्वर द्वारा उपदिष्ट होने से वेद स्वतः प्रमाण हैं।
एक अन्य स्थान पर वेद की महिमा का वर्णन इस प्रकार है।
बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे।
अर्थात् वेद की वाक्य-रचना बुद्धिपूर्वक है।
-वै0 ६.१.१
उसमें सृष्टिक्रम-विरूद्ध गपोड़े और असम्भव बातें नहीं हैं, अतः वह ईश्वरीय ज्ञान है।
सांख्यकार महर्षि कपिल को कुछ लोग भ्रान्ति से नास्तिक समझते हैं। वस्तुतः वे नास्तिक थे नहीं। महर्षि कपिल ने भी वेद को स्वतः प्रमाण माना है -
वेद पौरूषेय-पुरुषकृत नहीं हैं, क्योंकि उनका रचयिता कोई पुरुष नहीं है। जीव अल्पज्ञ और अल्पशक्ति होने से समस्त विद्याओं के भण्डार वेद की रचना में असमर्थ है। वेद मनुष्य की रचना न होने से उनका अपौरूषेयत्व सिद्ध ही है।
-सांख्य ५.४६
वेद अपौरूषेयशक्ति से, जगदीश्वर की निज शक्ति से अभिव्यक्त होने के कारण स्वतः प्रमाण हैं।
-सांख्य ५.५९
….ईश्वर शास्त्र = वेद का कारण है। अर्थात् वेदज्ञान ईश्वर-प्रदत्त है।
-वेदान्त १.१.३
इस सूत्र पर शंकराचार्य का भाष्य पठनीय है। हम यहाँ उसका हिन्दी रूपान्तर दे रहे हैं-
‘ऋग्वेदादि जो चारों वेद हैं, वे अनेक विद्याओं से युक्त हैं। सूर्यादि के समान सब सत्यार्थों का प्रकाश करने वाले हैं। उनको बनानेवाला सर्वज्ञत्वादि गुणों से युक्त सर्वज्ञ-ब्रह्म ही है, क्योंकि ब्रह्म से भिन्न कोई जीव सर्वगुणयुक्त इन वेदों की रचना कर सके ऐसा सम्भव नहीं है।’ ….
मीमांसा शास्त्र के कर्त्ता जैमिनि ने तो धर्म का लक्षण ही इस प्रकार किया है-
चोदनालक्षणोर्थो धर्मः।।
अर्थात् जिसके लिए वेद की आज्ञा हो, वह धर्म और जो वेदविरूद्ध हो वह अधर्म है।
-मीमांसा १.१.३
नित्यस्तु स्याद्दर्शनस्य परार्थत्वात्।।
अर्थात् शब्द नित्य है, नाश रहित है, क्योंकि उच्चारण क्रिया से जो शब्द का श्रवण होता है, वह अर्थ ज्ञान के लिए ही है। यदि शब्द अनित्य होता तो अर्थ का ज्ञान न हो सकता।
-मीमांसा १.३.१८ब्रह्मणकार की दृष्टि में वेदों का क्या महत्त्व है, यह इस आख्यायिका से स्पष्ट है।
महर्षि वाल्मीकि ने ब्राह्मणों के मुख से वेद का गौरव इस प्रकार व्यक्त कराया है-
या हि नः सततं बुद्धिर्वेदमन्त्रानुसारिणी।….
-वा0 रा0 अयो0 ५४.२४.२५
जब श्रीराम वन को प्रस्थान कर रहे थे, उस समय अनेक ब्राह्मणों ने भी उनके साथ जाने का निश्चय कर श्रीराम से कहा था- हे वत्स ! हमारा मन जो अब तक केवल वेद के स्वाध्याय की ओर ही लगा रहता था, अब उस ओर न लग आपकी वन-यात्रा की ओर लगा हुआ है। हमारा परम धन जो वेद है वह तो हमारे हृदय में है और हमारी स्त्रियाँ अपने-अपने पतिव्रत्य से अपनी रक्षा करती हुई घरों में रहेंगी।
रामायण के पश्चात् अब महाभारत में वेद के गौरव-विषयक विचारों का अवलोकन कीजिए। वेद की गौरव-गरिमा का गान करते हुए महर्षि व्यास लिखते हैं-
‘सृष्टि के आरम्भ में स्वयम्भू परमेश्वर ने वेदरूप नित्य दिव्यवाणी का प्रकाश किया, जिससे मनुष्यों की प्रवृत्तियाँ होती हैं।’
-महा. शान्ति २३२.२४
अर्थ सहित वेदाध्ययन के महत्तव पर बल देते हुए महर्षि व्यास लिखते हैं-
‘जो वेद और शास्त्रों को कण्ठस्थ करने में तत्पर है, परन्तु उनके अर्थ से अनभिज्ञ है, उसका कण्ठस्थ करना व्यर्थ ही है। जो ग्रन्थ के तात्पर्य को नहीं समझता, वह ग्रन्थ को रटकर मानों उसका बोझ ही ढोता है, परन्तु जो अर्थ-ज्ञानपूर्वक पढ़ता है, उसका पढ़ना ही सार्थक है।’
-महा. शान्ति ३0५.१३.१४
इसी तथ्य को महर्षि यास्क ने इस प्रकार प्रकट किया है- स्थाणुरयं भारहारः किलाभूदधीत्य वेदं न विजानाति योडर्थम्।
योडर्थज्ञ इत्सकलं भद्रमष्नुते नाकमेति ज्ञानविधूतपाप्मा।।
अर्थात् जो मनुष्य वेद पढ़कर उसके अर्थों को नहीं जानता, वह भारवाही पशु अथवा वृक्ष के ठूँठ के समान है, परन्तु जो अर्थ को जाननेवाला है, वह उस पवित्र ज्ञान के द्वारा अधर्म से बचकर परम पवित्र होता है। वह कल्याण का भागी होता है और अन्त में दुःखरहित मोक्ष-सुख को प्राप्त होता है।
-निरूक्त १.१८
पाठकगण! इस संदर्भ का यह अर्थ मत लगाइए कि हमें अर्थ नहीं आते, अतः पढ़ने से छुट्टी मिल गई। ‘वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना प्रत्येक आर्य का परमधर्म है।’ प्रतिदिन वेदपाठ कीजिए। न पढ़ने से पढ़ना उत्तम है लीजिए इस विषय में महर्षि दयानन्द के विचार पढ़िए-
‘‘अर्थज्ञानसहित पढ़ने से ही परमोत्तम फल की प्राप्ति होती है, परन्तु न पढ़नेवाले से तो पाठमात्र-कर्त्ता भी उत्तम होता है। जो शब्दार्थ के विज्ञानसहित अध्ययन करता है वह उत्तमतर है, जो वेदों का अध्ययन कर उनके अर्थों को जानकर शुभ गुणों का ग्रहण और उत्तम कर्मों का आचरण करते हुए सर्वोपकारी होता है वह उत्तमोत्तम है।’’
-ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, पठनपाठनविषयः
पाठकों ने मन्वादिस्मृतियों में, ब्राह्मणग्रन्थों एवं इतिहासग्रन्थों में वेद के गौरव-विषयक विचार पढ़े। अब हम पुराणों के कुछ स्थल प्रस्तुत करना चाहते हैं। पुराण भी वेद की महिमा से भरे हुए हैं। श्रीमद्भागवत का कथन है-
वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः।
वेदो नारायणः साक्षात्स्वयंभूरिति शुश्रुम।।
अर्थात् जो वेद में कहा है वही धर्म है और जो वेद के विरूद्ध है वही अधर्म है। वेद साक्षात् नारायणस्वरूप हैं, क्योंकि वे (भगवान् के श्वासमात्र) से स्वयं प्रकट हुए हैं, ऐसा हमने सुना है।
-भा0पु0 ६.१.४0
अब कूर्मपुराण का एक वचन देखिए-
एकतस्तु पुराणानि सेतिहासानि कृत्स्नशः।
एकत्र परमं वेदमेतदेवातिरिच्यते।।
अर्थात् एक ओर इतिहाससहित सम्पूर्ण पुराण और एक ओर परम वेद-इनमें वेद ही परम हैं, महान् हैं, श्रेष्ठ हैं।
-कूर्म0 उ0 ४६.१२९
देवीभागवत पुराण में वेद का महत्त्व इन शब्दों में प्रकट किया गया है-
सर्वथा वेद एवासौ धर्ममार्गप्रमाणकः….।
अर्थात् धर्म के विषय में वेद ही प्रमाण है। जो कुछ वेद अविरूद्ध एवं वेदानुकूल है वही प्रामाणिक है, अन्य नहीं। जो वेद को छोड़कर दूसरे ग्रन्थों को प्रामाणिक मानता है, उसके लिए यमलोक में कुण्ड तैयार हैं, अर्थात् वह यमलोक में जलकुण्डों में गिरता है।
-देवी भाग. ११.१.२६.२७
वेद की महिमा महान् है। मानव बुद्धि और उसका सीमित ज्ञान वेद की महिमा का बखान करने में असमर्थ हैं, अतः अन्त में गरूड़पुराण की सम्मति देकर हम इस प्रसगं को समाप्त करना चाहते हैं।
सत्यं सत्यं पुनः सत्यमुद्धृत्य भुजमुच्यते।
वेदाच्छास्त्रं परं नास्ति न देवः केषवात् परः।।
अर्थात् मैं दुहाई देकर और भुजा उठाकर सत्य-सत्य कहता हूँ कि वेद से बढ़कर कोई शास्त्र नहीं है और केशव = परमात्मा से बढ़कर कोई देव नहीं है।
-गरुड़० बर्० का० १०१ॱ५५
उपनिषद:
इसमें ईश्वर, आत्मा और परब्रह्म के स्वभाव और आपसी संबद्ध का बहुत ही दार्शनिक और ज्ञानपूर्वक वर्णन किया गया है ।कुछ विद्वानों के अनुसार, ब्राह्मण, आरण्यक, संहिता और उपनिषद के योग को भी समग्र वेद कहा जाता है। वेदों का अध्ययन इतना विशाल और गहरा है जिसका आदि और अंत समझना बहुत कठिन है। शोध रिपोर्टों के अनुसार वेदों का सार उपनिषद में समाया है और उपनिषद का सार भागवत गीता को माना गया है। इस क्रम में वेद, उपनिषद और भागवत गीता है वास्तविक हिन्दू धर्म ग्रंथ हैं, अन्य और कोई नहीं हैं। वेद स्म्र्तियोन में वेद वाक्यों को विस्तार से समझाया गया है। वाल्मीकि रामायण और महाभारत को इतिहास और पुराणों की प्राचीन ऐतिहासिक ग्रंथ माना गया है। इसलिए हिन्दू मनीषियों ने वेद, उपनिषद और गीता के पाठ को ही उचित बताया गया है जिसका मुख्य कारण इन ग्रन्थों में वेदों के सारे ज्ञान को संक्षेप और सरल शब्दों में बताया गया है।
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