उर्दू के प्रसिद्ध शायर ख्वाजा दिल मोहम्मद जी ने भी सरल उर्दू पद में श्री गीता जी का श्लोकशः अनुवाद किया है। वंदनीय सदगुरुदेव "स्वामी श्रीगीतानंद जी महाराज" के आशीर्वाद से ये छोटा सा प्रयास है हमारी तरफ से गीता जी का उर्दू पद्यानुवाद पर प्रकाश डालने की कोशिश की गई है। आशा है कि ये गीता प्रेमियो में दिव्य रस का संचार करता हुआ उन्हें आध्यात्मिक मंज़िलो तक ले जाएगा।
गुरुवार, 30 जुलाई 2020
बुधवार, 22 जुलाई 2020
शनिवार, 30 मई 2020
हर कार्य की सिद्धि होती है कामिका एकादशी कथा और महत्व
ॐ गं गणपतये नमः
जय श्रीकृष्ण मित्रों ! आज कामिका एकादशी है जानते है इस का महत्व
कामिका एकादशी
युधिष्ठिर ने पूछा : गोविन्द ! वासुदेव ! आपको मेरा नमस्कार है ! श्रावण (गुजरात महाराष्ट्र के अनुसार आषाढ़) के कृष्णपक्ष में कौन सी एकादशी होती है ? कृपया उसका वर्णन कीजिये ।
भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! सुनो । मैं तुम्हें एक पापनाशक उपाख्यान सुनाता हूँ, जिसे पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने नारदजी के पूछने पर कहा था ।
नारदजी ने प्रशन किया : हे भगवन् ! हे कमलासन ! मैं आपसे यह सुनना चाहता हूँ कि श्रवण के कृष्णपक्ष में जो एकादशी होती है, उसका क्या नाम है? उसके देवता कौन हैं तथा उससे कौन सा पुण्य होता है? प्रभो ! यह सब बताइये ।
ब्रह्माजी ने कहा : नारद ! सुनो । मैं सम्पूर्ण लोकों के हित की इच्छा से तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दे रहा हूँ । श्रावण मास में जो कृष्णपक्ष की एकादशी होती है, उसका नाम ‘कामिका’ है । उसके स्मरणमात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है । उस दिन श्रीधर, हरि, विष्णु, माधव और मधुसूदन आदि नामों से भगवान का पूजन करना चाहिए ।
भगवान श्रीकृष्ण के पूजन से जो फल मिलता है, वह गंगा, काशी, नैमिषारण्य तथा पुष्कर क्षेत्र में भी सुलभ नहीं है । सिंह राशि के बृहस्पति होने पर तथा व्यतीपात और दण्डयोग में गोदावरी स्नान से जिस फल की प्राप्ति होती है, वही फल भगवान श्रीकृष्ण के पूजन से भी मिलता है ।
जो समुद्र और वनसहित समूची पृथ्वी का दान करता है तथा जो ‘कामिका एकादशी’ का व्रत करता है, वे दोनों समान फल के भागी माने गये हैं ।
जो ब्यायी हुई गाय को अन्यान्य सामग्रियोंसहित दान करता है, उस मनुष्य को जिस फल की प्राप्ति होती है, वही ‘कामिका एकादशी’ का व्रत करनेवाले को मिलता है । जो नरश्रेष्ठ श्रावण मास में भगवान श्रीधर का पूजन करता है, उसके द्वारा गन्धर्वों और नागोंसहित सम्पूर्ण देवताओं की पूजा हो जाती है ।
अत: पापभीरु मनुष्यों को यथाशक्ति पूरा प्रयत्न करके ‘कामिका एकादशी’ के दिन श्रीहरि का पूजन करना चाहिए । जो पापरुपी पंक से भरे हुए संसारसमुद्र में डूब रहे हैं, उनका उद्धार करने के लिए ‘कामिका एकादशी’ का व्रत सबसे उत्तम है । अध्यात्म विधापरायण पुरुषों को जिस फल की प्राप्ति होती है, उससे बहुत अधिक फल ‘कामिका एकादशी’ व्रत का सेवन करनेवालों को मिलता है ।
‘कामिका एकादशी’ का व्रत करनेवाला मनुष्य रात्रि में जागरण करके न तो कभी भयंकर यमदूत का दर्शन करता है और न कभी दुर्गति में ही पड़ता है ।
लालमणि, मोती, वैदूर्य और मूँगे आदि से पूजित होकर भी भगवान विष्णु वैसे संतुष्ट नहीं होते, जैसे तुलसीदल से पूजित होने पर होते हैं । जिसने तुलसी की मंजरियों से श्रीकेशव का पूजन कर लिया है, उसके जन्मभर का पाप निश्चय ही नष्ट हो जाता है ।
या दृष्टा निखिलाघसंघशमनी स्पृष्टा वपुष्पावनी
रोगाणामभिवन्दिता निरसनी सिक्तान्तकत्रासिनी ।
प्रत्यासत्तिविधायिनी भगवत: कृष्णस्य संरोपिता
न्यस्ता तच्चरणे विमुक्तिफलदा तस्यै तुलस्यै नम: ॥
‘जो दर्शन करने पर सारे पापसमुदाय का नाश कर देती है, स्पर्श करने पर शरीर को पवित्र बनाती है, प्रणाम करने पर रोगों का निवारण करती है, जल से सींचने पर यमराज को भी भय पहुँचाती है, आरोपित करने पर भगवान श्रीकृष्ण के समीप ले जाती है और भगवान के चरणों मे चढ़ाने पर मोक्षरुपी फल प्रदान करती है, उस तुलसी देवी को नमस्कार है ।’
जो मनुष्य एकादशी को दिन रात दीपदान करता है, उसके पुण्य की संख्या चित्रगुप्त भी नहीं जानते । एकादशी के दिन भगवान श्रीकृष्ण के सम्मुख जिसका दीपक जलता है, उसके पितर स्वर्गलोक में स्थित होकर अमृतपान से तृप्त होते हैं । घी या तिल के तेल से भगवान के सामने दीपक जलाकर मनुष्य देह त्याग के पश्चात् करोड़ो दीपकों से पूजित हो स्वर्गलोक में जाता है ।’
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : युधिष्ठिर ! यह तुम्हारे सामने मैंने ‘कामिका एकादशी’ की महिमा का वर्णन किया है । ‘कामिका’ सब पातकों को हरनेवाली है, अत: मानवों को इसका व्रत अवश्य करना चाहिए । यह स्वर्गलोक तथा महान पुण्यफल प्रदान करनेवाली है । जो मनुष्य श्रद्धा के साथ इसका माहात्म्य श्रवण करता है, वह सब पापों से मुक्त हो श्रीविष्णुलोक में जाता है
जय श्रीकृष्ण मित्रों ! आप को ये ब्लॉग कैसा लगा कमेंट जरूर करे। मित्रों आप से एक बात शेयर करना चाहूँगा कि मैंने एक साइट बनाई है जिस में आपके आसपास कोई भी अपना या नज़दीकी ग़ुम हो गया है तो आप मेरी इस वेबसाइट पर संपर्क कर सकते है और आशा करता हूँ आप इस वेबसाइट को अधिक से अधिक शेयर करे।
गुरुवार, 30 जनवरी 2020
आप जानते है भगवान् विष्णु का महाशक्ति (६४ कला संपन्न) चौबीसवाँ अवतार कलयुग में होगा कब और कहाँ : कल्कि अवतार
आप जानते है भगवान् विष्णु का महाशक्ति चौबीसवाँ अवतार जो कलयुग में होगा कब और कहाँ : कल्कि अवतार
जय श्रीकृष्ण मित्रों ! आपने अब तक भगवान विष्णु के २४ अवतारों में २३ अवतारों का वर्णन विस्तार से पढ़ा। आज आप को २४ वें अवतार के विषय में बताना चाहूँगा।
२४ - कल्कि अवतार
धर्म ग्रंथों के अनुसार कलयुग में भगवान विष्णु कल्कि रूप में अवतार लेंगे। कल्कि अवतार कलियुग व सतयुग के संधिकाल में होगा। पुराणों के अनुसार उत्तरप्रदेश के मुरादाबाद जिले के शंभल नामक स्थान पर विष्णुयशा नामक तपस्वी ब्राह्मण के घर भगवान कल्कि पुत्र रूप में जन्म लेंगे। कल्कि देवदत्त नामक घोड़े पर सवार होकर संसार से पापियों का विनाश करेंगे और धर्म की पुन:स्थापना करेंगे।
अब विस्तार से वर्णन :
श्रीमद्धभागवतपुराण अनुसार :
नैमिषारण्य में सूत शौनक वार्ता चल रही थी। समस्त अवतारों की कथा लीला संदोह सुनने के उपरान्त ज्ञान की अन्यतम जिज्ञासा वाले शौनक मुनियों ने महर्षि लोमहर्षक के सुपुत्र श्री सूत जी से प्रश्न किया-भगवन्। द्वापर तक की व तदुपरांत बुद्धावतार की कथा पूरी हो चुकी। अब कृपया यह बताइये कि कलियुग जब पराकाष्ठा पर होगा तो भगवान का जन्म किस रूप में होगा। उस समय ऐसी कौन सी दुरात्माएं होंगी जिन्हें मारने के लिए भगवान अवतार लेंगे। वह कथा भी हमें विस्तार से सुनाएं।
श्री सूत जी बोले-हे मुनीश्वरो-ब्रह्माजी ने अपनी पीठ से घोर मलीन पातक को उत्पन्न किया, जिसका नाम रखा गया अधर्म। अधर्म जब बड़ा हुआ तब उसका मिथ्या से विवाह कर दिया गया। दोनों के संयोग से महाक्रोधी पुत्र दम्भ तथा माया नाम की कन्या जन्मी। फिर दम्भ व माया के संयोग से लोभ नामक पुत्र और विकृति नामक कन्या हुई। दोनों ने क्रोध को जन्म दिया। क्रोध से हिंसा व दोनों के संयोग से काली देह वाले महाभयंकर कलि का जन्म हुआ। काकोदर कराल, चंचल, भयानक, दुर्गन्धयुक्त शरीर, द्यूत, मद्य, स्वर्ण और वेश्या में निवास करने वाले इस कलि की बहिन व संतानों के रूप में दुरुक्ति, भयानक, मृत्यु निरथ, यातना का जन्म हुआ जिसके हजारों अधर्मी पुत्र-पुत्री आधि-व्याधि, बुढ़ापा, दुख शोक,पतन,भोग-विलास आदि में निवास कर यज्ञ, तप,दान, स्वाध्याय, उपासना आदि का नाश करने लगे।
पुराणकथाओं के अनुसार कलियुग में पाप की सीमा पार होने पर विश्व में दुष्टों के संहार क लिये कल्कि अवतार प्रकट होगा। कल्कि अवतार कलियुग के अन्त के लिये होगा। ये विष्णु जी के अवतारो मै से एक है। जब कलियुग मै लोग धर्म का अनुसरण करना बन्द कर देगे तब ये आवतार होगा। कल्कि की कथा कल्कि पुराण में आती है। कलियुग के अन्त में इक्कीसवीं बार विष्णु यश नामक ब्राह्मण के घर भगवान का कल्कि अवतार होगा|
आज विश्व में मानवता त्राहि - त्राहि कर रही है और जो पापाचार बढ़ रहे हैं उनको देखकर बहुत कष्ट होता है। इस स्थिति में सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार भगवान के अवतार की ओर ध्यान जाता है।
‘‘ यदा यदा हिधर्मस्य ग्लार्निभवति भारतःअभ्युत्थानम धर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम,परित्राणय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्, धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे।’’
अर्थात् जब - जब धर्म की हानि होती है, भूमि पर भार बढ़ता है तब-तब धर्म की संस्थापना के लिए, साधुजनों की रक्षा के लिए, दुष्टों के विनाश के लिए मैं युग-युग में अवतार लेता हूँ।
भगवान सूर्य के प्रकाश की पहली किरण जब भारत की पवित्र भूमि को छूती थी तो सारा वातावरण पूजा की घंटियों और शंखनाद से गूंज उठता था। मंदिरों के पट खुल जाते थे और भगवान का अभिषेक सारे भारत में एक साथ आरम्भ हो जाता था। भारत भूमि ऋषिओं और देवताओं की भूमि है, इसके कण - कण में आध्यात्मिक चेतना है, जो भगवान का नाम लेकर जागती थी और भगवान का कीर्तन करते हुए सोती थी। महर्षि वेद-व्यास जी ने श्रीमद् भागवत् के 12 स्कन्ध के दूसरे अध्याय में स्पष्ट शब्दों में कहा है कि श्री कृष्ण जब अपनी लीला संवरण करके परम धाम को पधार गये उसी समय से कलियुग ने संसार में प्रवेश किया। उसी के कारण मनुष्यों की मति - गति पाप की ओर ढुलक गयी। धर्म कष्ट से प्राप्त होता है और अधः पतन सुखों से, इसलिए भोली भाली जनता को गिरने में देर नहीं लगी।
सत्य सनातन धर्म शाश्वत धर्म है। भगवान का मानवता के उत्थान, दुष्टों के संहार, धर्म की संस्थापना और भक्तों की रक्षा के लिए पंच भौतिक संसार में साक्षात् होना ही अवतार कहलाता है। केवल भगवत् अवतार से ही धर्म की पूर्ण संस्थापना हो सकती है। महात्माओं के आने से केवल आंशिक रूप से ही सत्य की स्थापना हो पाती है। युग परिवर्तनकारी भगवान श्री कल्कि के अवतार का प्रायोजन विश्व कल्याण है। भगवान का यह अवतार ‘‘निष्कलंक भगवान’’ के नाम से भी जाना जायेगा।
भगवान का अवतार कहाँ होगा (विस्तार पूर्वक वर्णन)
श्रीमद् भागवत महापुराण में विष्णु के अवतारों की कथाएं विस्तार से वर्णित हैं। इसके बारहवें स्कन्ध के द्वितीय अध्याय में भगवान के कल्कि अवतार की कथा कुछ विस्तार से दी गई, कहा गया है कि‘‘ सम्भल ग्राम, मुख्यस्य ब्राह्मणस्य महात्मनः भवने विष्णुयशसः कल्कि प्रादुर्भाविष्यति।।
"सम्भल ग्राम में विष्णुयश नामक श्रेष्ठ ब्राह्मण के पुत्र के रूप में भगवान कल्कि का जन्म होगा।"
"वे देवदत्त नाम के घोड़े पर आरूढ़ होकर अपनी कराल करवाल (तलवार) से दुष्टों का संहार करेंगे तभी सतयुग का प्रारम्भ होगा।"
"समस्त विश्व का कल्याण इस अवतार का प्रायोजन है। भगवान श्री कल्कि निष्कलंक अवतार हैं।"
"उनके पिता का नाम विष्णुयश और माता का नाम सुमति होगा।"
"उनके भाई जो उनसे बड़े होंगे क्रमशः सुमन्त, प्राज्ञ और कवि नाम के नाम के होंगे।"
"याज्ञवलक्य जी पुरोहित और भगवान परशुराम उनक गुरू होंगे।"
"भगवान श्री कल्कि की दो पत्नियाँ होंगी - लक्ष्मी रूपी पद्मा और वैष्णवी शक्ति रूपी रमा।"
"उनके पुत्र होंगे - जय, विजय, मेघमाल तथा बलाहक।"
भगवान का स्वरूप (सगुण रूप) परम दिव्य एवम् ज्योतिमय होता है। उनके स्परूप की कल्पना उनके परम अनुग्रह से ही की जा सकती है। भगवान श्री कल्कि अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड नायक हैं। शक्ति पुरूषोत्तम भगवान श्री कल्कि अद्वितीय हैं। भगवान श्री कल्कि दुग्ध वर्ण अर्थात् श्वेत अश्व पर सवार हैं। अश्व का नाम देवदत्त है। भगवान का रंग गोरा है, परन्तु क्रोध में काला भी हो जाता है। भगवान पीले वस्त्र धारण किये हैं। प्रभु के हृदय पर श्रीवत्स का चिह्न अंकित है। गले में कौस्तुभ मणि सुशोभित है। भगवान पूर्वाभिमुख व अश्व दक्षिणामुख है। भगवान श्री कल्कि के वामांग में लक्ष्मी (पद्मा) और दाएं भाग में वैष्णवी (रमा) विराजमान हैं। पद्मा भगवान की स्वरूपा शक्ति और रमा भगवान की संहारिणी शक्ति हैं। भगवान के हाथों में प्रमुख रूप से नन्दक व रत्नत्सरू नामक खड्ग (तलवार) है। शाऽग नामक धनुष और कुमौदिकी नामक गदा है। भगवान कल्कि के हाथ में पांचजन्य नाम का शंख है। भगवान के रथ अत्यन्त सुन्दर व विशाल हैं। रथ का नाम जयत्र व गारूड़ी है। सारथी का नाम दारूक है। भगवान सर्वदेवमय व सर्ववेदमय हैं। सब उनकी विराट स्वरूप की परिधि में हैं। भगवान के शरीर से परम दिव्य गंध उत्पन्न होती है जिसके प्रभाव से संसार का वातावरण पावन हो जाता है।
रविवार, 9 जुलाई 2017
गुरु पूर्णिमा महोत्सव
ॐ गं गणपतये नमः
सम्पूर्ण भारत में गुरु पूर्णिमा पर्व आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को श्रद्धाभाव व उत्साहपूर्वक मनाया जाता है। यह पर्व जीवन में गुरु की महत्ता व महर्षि वेद व्यास को समर्पित है। भारतवर्ष में कई विद्वान गुरु हुए हैं, किन्तु महर्षि वेद व्यास प्रथम विद्वान थे, जिन्होंने सनातन धर्म (हिन्दू धर्म) के चारों वेदों की व्याख्या की थी। सिख धर्म में भी गुरु को भगवान माना जाता इस कारण गुरु पूर्णिमा सिख धर्म का भी अहम त्यौहार बन चुका है।
सिख धर्म केवल एक ईश्वर और अपने दस गुरुओं की वाणी को ही जीवन का वास्तविक सत्य मानता है। सिख धर्म की एक प्रचलित कहावत निम्न है:
‘गुरु गोविंद दोउ खड़े काके लागू पांव, बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताए'।।
गुरु पूर्णिमा आध्यात्मिक सम्बन्ध याद करने के लिए नियत है गुरु पूर्णिमा के दिन परमात्मा वहुत खुश होते है उस दिन हर दरवाजा भक्त के लिए खुला होता है वो जो चाहे परमेश्वर से मांग सकता है उस दिन भक्त के द्वारा लिया हुआ हर एक संकल्प पूर्ण होता है और कोई विरोध नहीं होता, उस दिन भक्त के द्वारा किया गया भजन, पाठ, आराधन, जप, ध्यान, लाखो गुना फल देता है गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व अपने गुरु को शुक्रिया करने, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए भी है कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए समर्पण एक विधि है इस दिन शिष्य अपने सद्गुरु को समर्पण के द्वारा शुक्रिया कहता है समर्पण तीन तरह से कर सकते है
(1)तन का समर्पण – शारीरिक सेवा दे कर
(2) मन का समर्पण – जप ध्यान आराधन करके
(3) धन का समर्पण – अपने धन में से कुछ समर्पण करके
शास्त्र कहते है कि इस दिन शिष्य जो कुछ समर्पण करता है उसका लाखो गुना वापस पाता है जैसे अगर शारीरक सेवा द्वारा समर्पण किया जाये तो शिष्य की शारीरक स्वस्थता और सामर्थ्य बढ़ता है, मन का समर्पण करने से मन बलवान होता है,और धन का समर्पण करने से एक तो धन पवित्र होता है, और दूसरा उसमे कई गुना वृद्धि होती है, तो ये महत्वपूर्ण दिन व्यर्थ मत जाने दीजियेगा कुछ न कुछ समर्पण जरूर कीजियेगा।
जय श्रीकृष्ण मित्रों !
गुरुवार, 6 जुलाई 2017
आप जानते है भगवान विष्णु का योगनिद्रा काल : चातुर्मास कहलाता है (भाग - दूसरा)
ॐ गं गणपतये नमः
जय श्रीकृष्ण मित्रों ! आप ने शयनी एकादशी के विषय में पढ़ा। देवशयनी एकादशी के साथ ही चातुर्मास शुरू हो जाता है। कल इस विषय के बारे में पढ़ा। आज आगे बढ़े
इन चार महीनों के दौरान मनोरम माहौल और प्रफुल्लित चित्त के साथ प्रकृति के शांत वातावरण में ईश्वर की आराधना पर खासतौर से बल दिया गया है। व्यक्ति के किसी मांगलिक कार्यक्रमों में लिप्त नहीं होने से वह बाहरी जवाबदारियों से मुक्त होकर ईश्वर की भक्ति में ध्यान लगा सकता है। चातुर्मास के चार महीनों यानी सावन, भादौ, आश्विन और कार्तिक माह में खाने-पाने और व्रत व उपवास की सलाह दी गई है। चातुर्मास में व्यक्ति की पाचनशक्ति कमजोर पड़ जाती है, इसलिए इस संपूर्ण महीने में व्यक्ति को व्रत व उपवास करने की सलाह दी गई है। खासकर कि इस समय के दौरान पड़ने वाली तमाम एकादशियों में निर्जला उपवास किया जाता है। यदि सभी एकदशियों में निर्जल उपवास नहीं हो पाए तो कम से कम तीन एकादशी (देवशयनी, जलजिलनी और देव उठनी एकादशी) के दिन निर्जल उपवास जरुर करना चाहिए एेसा संतजनों का कहना है।
गुरु पूर्णिमा, हरियाली तीज, नागपंचमी, रक्षाबंधन, कृष्ण जन्माष्टमी, विजयदशमी, अहोई अष्टमी, करवा चौथ, दीपावली, भैया दूज, छठ पूजा और नदी स्नान के विशेष महत्व वाली कार्तिक पूर्णिमा ऐसे ही मौके हैं। चातुर्मास में 'पितृपक्ष' का पखवाड़ा और नवरात्र के नौ दिन ऐसे अवसर होते हैं, जब स्वास्थ्य और अध्यात्म दोनों की दृष्टि से आम गृहस्थ को विशेष निर्देश की जरूरत होती है।
गुरु पूर्णिमा का बड़ा महत्व
गुरु का स्थान गोविंद से आगे यूं ही नहीं माना गया। चतुर्मास में भूलोक की पालना का भार गुरुवर्ग के भरोसे छोड़कर ही भगवान श्री विष्णु शयन करने पाताल लोक जाते हैं। इसीलिए गुरु भी इस चतुर्मास में कहीं नहीं जाते। शिष्यों को पूर्व सूचना के साथ पूर्व निर्धारित एक ही स्थान पर रहते हैं। इसीलिए चतुर्मास की पहली पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा कहा जाता है। शिष्य गुरु को साक्षात अपने सामने बिठाकर पूजा करते हैं। (गुरु पूर्णिमा का वर्णन अगले ब्लॉग में करुँगा)
आयुर्वेद की दृष्टि से चातुर्मास :
आयुर्वेद की दृष्टि से भी उपवास के लिए यह समय उत्तम माना गया है। वजह यह है कि श्रावण के महीने में हरी सब्जियों में सूक्ष्म जंतुओं के होने की संभावनाए बहुत होने से अंकुरित चीजों को खाने की सलाह दी जाती है। भादों की बरसात के बाद जलवायु परिवर्तन की वजह से एकाएक गर्मी बढ़ जाती है। एेसे में यदि इंसान दही का सेवन करता है तो पित्त या अम्ल की समस्या का शिकार हो सकता है। इससे बचने के लिए दही को खाने के लिए वर्जित कहा गया है। इसके अलावा, इन आषाढ़ माह में दूध पीने से पानी से पैदा होने वाले रोग और कार्तिक माह में दाल को सेवन करने से अपच की समस्या हो सकती है, इसलिए इस दौरान इन आहार का सेवन करने की मनाही की गई है।
चातुर्मास के दौरान श्रावण महीने में विविध त्यौहारों में उपवास के अलावा भादो में पितृ तर्पण और आषाढ़ में नवरात्रि की पूर्जा-अर्चना-अनुष्ठान और उपवास द्वारा धार्मिक और आध्यात्मिक संतुलन बनाने के साथ-साथ शारीरिक आरोग्यता की दिशा में भी हमारे शास्त्रों में विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।
बुधवार, 5 जुलाई 2017
आप जानते है भगवान विष्णु का योगनिद्रा काल : चातुर्मास कहलाता है (भाग - पहला)
ॐ गं गणपतये नमः
जय श्रीकृष्ण मित्रों ! कल आप ने शयनी एकादशी के विषय में पढ़ा। देवशयनी एकादशी के साथ ही चातुर्मास शुरू हो जाता है। इस के साथ ही चार माह तक कोई मांगलिक कार्य नहीं होता। देवोत्थान एकादशी के साथ शुभ कार्यों की शुरुआत होगी। आषाढ़ शुक्ल एकादशी से भगवान विष्णु पाताल लोक में सोने चले जाते है। इस कारण इन चार माह में शुभ कार्यों को वर्जित माना गया है।
पुराणों में कहा गया है कि भगवान विष्णु आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चारमास पर्यन्त पाताल में राजा बली के यहाँ निवास करते हैं। आप ने विष्णु अवतार में भगवान वामन के अवतार के विषय को विस्तार से पढ़ा था।
भगवान् विष्णु का पन्द्रहवाँ अवतार : वामन अवतार
वामन रूप में भगवान ने एक पग में स्वर्ग और दूसरे पग में पृथ्वी को नाप लिया। तीसरा पैर कहाँ रखें? बलि के सामने संकट उत्पन्न हो गया। यदि वह अपना वचन नहीं निभाता तो अधर्म होता। आखिरकार उसने अपना सिर भगवान के आगे कर दिया और कहा तीसरा पग आप मेरे सिर पर रख दीजिए। वामन भगवान ने वैसा ही किया। पैर रखते ही वह रसातल लोक में पहुँच गया।जब बाली रसातल में चला गया तब बलि ने अपनी भक्ति के बल से भगवान को रात-दिन अपने सामने रहने का वचन ले लिया और भगवान विष्णु को उनका द्वारपाल बनना पड़ा। भगवान के रसातल निवास से परेशान कि यदि स्वामी रसातल में द्वारपाल बन कर निवास करेंगे तो बैकुंठ लोक का क्या होगा? इस समस्या के समाधान के लिए लक्ष्मी जी को नारद जी ने एक उपाय सुझाया। लक्ष्मी जी ने राजा बलि के पास जाकर उसे रक्षाबन्धन बांधकर अपना भाई बनाया और उपहार स्वरुप अपने पति भगवान विष्णु को अपने साथ लेगयी तब से ऋषि मुनियों एवं देवताओं ने भगवान की पूजा एवं स्तुति की। राजा बलि ने भगवान विष्णु जी से चार मास तक पाताल लोक में रहने का आग्रह किया।
वर्षाकाल के चार महीने सावन, भादों, आश्विन और कार्तिक में सम्पन्न होने वाला उपवास का नाम है चातुर्मास।
चातुर्मास में व्रत के साथ-साथ कुछ नियमों का पालन करना चाहिए -
- चार मासों तक व्रती को कुछ खाद्य पदार्थ त्यागने चाहिए, इस संबंध में सिद्धांत यह है कि श्रावण मास में शाक, भाद्रपद में दही, आश्विन मास में दूध और कार्तिक मास में दालें ग्रहण नहीं करनी चाहिए।
- चातुर्मास्य का व्रत करने वाले को शय्या-शयन, मांस, मधु आदि का त्याग करना चाहिए। उसे जमीन पर शयन करना चाहिए, पूर्णतः शाकाहारी रहना चाहिए तथा मधु आदि रसदार वस्तुओं का सेवन नहीं करना चाहिए।
- गुड़, तेल, दूध, दही, बैंगन, शाकपत्र आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। उक्त खाद्य पदार्थों के त्याग का शास्त्रों में निम्नलिखित फल कहे गए हैं -
- गुड़ त्याग से मधुर स्वर प्राप्त होता है।
- कड़वे तेल त्याग से शत्रु का नाश होता है।
- घृत त्याग से सौंदर्य मिलता है।
- शाक त्याग से बुद्धि एवं बहुपुत्र प्राप्त होते हैं।
- शाक एवं पत्रों के त्याग से पकवान की प्राप्ति होती है।
- दधि-दुग्ध त्याग से वंशवृद्धि होती है तथा व्रती गाओं के लोक में जाता है।
- चातुर्मास्य में जो व्यक्ति उपवास करते हुए नमक का त्याग करता है, उसके सभी कार्य सफल होते हैं।
मंगलवार, 4 जुलाई 2017
शयनी एकादशी महात्म्य
ॐ गं गणपतये नमः
शयनी एकादशी महात्म्य
जय श्रीकृष्ण मित्रों ! आज देवशयनी एकादशी है इस एकदशी को शयनी एकादशी भी कहा जाता है।
देवशयनी एकादशी पौराणिक महत्व
पुराणो के अनुसार देवशयनी एकादशी के दिन से भगवान श्री हरी विष्णु जी चार माह तक पाताल लोक में निवास अर्थात शयन मुद्रा में चले जाते है। कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन भगवान विष्णु जागृत होते है। इन चार माह में भगवान विष्णु जी क्षीर सागर में अनंत शैया पर शयन करते है। अतः इस अवधि में कोई भी धार्मिक कार्य नही किया जाता है।
शयनी एकादशी
युधिष्ठिर ने पूछा : भगवन् ! आषाढ़ के शुक्लपक्ष में कौन सी एकादशी होती है ? उसका नाम और विधि क्या है? यह बतलाने की कृपा करें ।
भगवान श्रीकृष्ण बोले : राजन् ! आषाढ़ शुक्लपक्ष की एकादशी का नाम ‘शयनी’ है। मैं उसका वर्णन करता हूँ । वह महान पुण्यमयी, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करनेवाली, सब पापों को हरनेवाली तथा उत्तम व्रत है । आषाढ़ शुक्लपक्ष में ‘शयनी एकादशी’ के दिन जिन्होंने कमल पुष्प से कमललोचन भगवान विष्णु का पूजन तथा एकादशी का उत्तम व्रत किया है, उन्होंने तीनों लोकों और तीनों सनातन देवताओं का पूजन कर लिया । ‘हरिशयनी एकादशी’ के दिन मेरा एक स्वरुप राजा बलि के यहाँ रहता है और दूसरा क्षीरसागर में शेषनाग की शैय्या पर तब तक शयन करता है, जब तक आगामी कार्तिक की एकादशी नहीं आ जाती, अत: आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक मनुष्य को भलीभाँति धर्म का आचरण करना चाहिए । जो मनुष्य इस व्रत का अनुष्ठान करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है, इस कारण यत्नपूर्वक इस एकादशी का व्रत करना चाहिए । एकादशी की रात में जागरण करके शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान विष्णु की भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिए । ऐसा करनेवाले पुरुष के पुण्य की गणना करने में चतुर्मुख ब्रह्माजी भी असमर्थ हैं ।
राजन् ! जो इस प्रकार भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाले सर्वपापहारी एकादशी के उत्तम व्रत का पालन करता है, वह जाति का चाण्डाल होने पर भी संसार में सदा मेरा प्रिय रहनेवाला है । जो मनुष्य दीपदान, पलाश के पत्ते पर भोजन और व्रत करते हुए चौमासा व्यतीत करते हैं, वे मेरे प्रिय हैं । चौमासे में भगवान विष्णु सोये रहते हैं, इसलिए मनुष्य को भूमि पर शयन करना चाहिए । सावन में साग, भादों में दही, क्वार में दूध और कार्तिक में दाल का त्याग कर देना चाहिए । जो चौमसे में ब्रह्मचर्य का पालन करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है । राजन् ! एकादशी के व्रत से ही मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है, अत: सदा इसका व्रत करना चाहिए । कभी भूलना नहीं चाहिए । ‘शयनी’ और ‘बोधिनी’ के बीच में जो कृष्णपक्ष की एकादशीयाँ होती हैं, गृहस्थ के लिए वे ही व्रत रखने योग्य हैं - अन्य मासों की कृष्णपक्षीय एकादशी गृहस्थ के रखने योग्य नहीं होती । शुक्लपक्ष की सभी एकादशी करनी चाहिए ।
शनिवार, 1 जुलाई 2017
आप जानते है राधे-कृष्ण के प्रेम का आरम्भ कब कैसे कहा हुआ
ॐ गं गणपतये नमः
प्रभु के यश का श्रवण और र्कीतन दोनों हमें पवित्र करते हैं । हृदय पवित्र होता है तो प्रभु हृदय में स्थित हो जाते हैं ( प्रभु का वास सभी जीवों में है पर अशुद्ध और अपवित्र विचार, आचरण के कारण प्रभु हमारे भीतर होते हुये भी हमारे लिए अदृश्य होते हैं ) । प्रभु के हृदयपटल पर स्थ्िात होते ही अशुभ वासनायें भाग खड़ी होती हैं और शुभ और पवित्र विचार, आचरण का संचार हमारे भीतर स्वतः हो जाता है। मित्रों आप से शुरुआत राधे-कृष्ण के नाम से ही करते है राधे-कृष्ण के प्रेम को सारे संसार में पूजा जाता है कृष्ण लीला के शुरुआत अपने अराध्ये के नाम और प्रेम से करते है राधे- राधेराधे-कृष्ण के प्रेम का आरम्भ कब कैसे कहा हुआ।
देवी राधा को पुराणों में श्री कृष्ण की शश्वत जीवनसंगिनी बताया गया है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में बताया गया है कि राधा और कृष्ण का प्रेम इस लोक का नहीं बल्कि पारलौक है। सृष्टि के आरंभ से और सृष्टि के अंत होने के बाद भी दोनों नित्य गोलोक में वास करते हैं।
लेकिन लौकिक जगत में श्रीकृष्ण और राधा का प्रेम मानवी रुप में था और इस रुप में इनके मिलन और प्रेम की शुरुआत की बड़ी ही रोचक कथा है। एक कथा के अनुसार देवी राधा और श्री कृष्ण की पहली मुलाकात उस समय हुई थी जब देवी राधा ग्यारह माह की थी और भगवान श्री कृष्ण सिर्फ एक दिन के थे। मौका था श्री कृष्ण का जन्मोत्सव।

मान्यता है कि देवी राधा भगवान श्री कृष्ण से ग्यारह माह बड़े थी और कृष्ण के जन्मोत्सव पर अपनी माता कीर्ति के साथ नंदगांव आई थी यहां श्री कृष्ण पालने में झूल रहे थे और राधा माता की गोद में थी।
भगवान श्री कृष्ण और देवी राधा की दूसरी मुलाकात लौकिक न होकर अलौकिक थी। इस संदर्भ में गर्ग संहिता में एक कथा मिलती है। यह उस समय की बात है जब भगवान श्री कृष्ण नन्हे बालक थे। उन दिनों एक बार एक बार नंदराय जी बालक श्री कृष्ण को लेकर भांडीर वन से गुजर रहे थे।
उसे समय आचानक एक ज्योति प्रकट हुई जो देवी राधा के रुप में दृश्य हो गई। देवी राधा के दर्शन पाकर नंदराय जी आनंदित हो गए। राधा ने कहा कि श्री कृष्ण को उन्हें सौंप दें, नंदराय जी ने श्री कृष्ण को राधा जी की गोद में दे दिया।
श्री कृष्ण बाल रूप त्यागकर किशोर बन गए। तभी ब्रह्मा जी भी वहां उपस्थित हुए। ब्रह्मा जी ने कृष्ण का विवाह राधा से करवा दिया। कुछ समय तक कृष्ण राधा के संग इसी वन में रहे। फिर देवी राधा ने कृष्ण को उनके बाल रूप में नंदराय जी को सौंप दिया।
राधा कृष्ण की लौकिक मुलाकात और प्रेम की शुरुआत संकेत नामक स्थान से माना जाता है। नंद गांव से चार मील की दूरी पर बसा है बरसाना गांव। बरसाना को राधा जी की जन्मस्थली माना जाता है। नंदगांव और बरसाना के बीच में एक गांव है जो 'संकेत' कहलाता है।
इस स्थान के विषय में मान्यता है कि यहीं पर पहली पर भगवान श्री कृष्ण और राधा जी का लौकिक मिलन हुआ था। हर साल राधाष्टमी यानी भाद्र शुक्ल अष्टमी से चतुर्दशी तिथि तक यहां मेला लगता है और राधा कृष्ण के प्रेम को याद कर भक्तगण आनंदित होते हैं।
इस स्थान का नाम संकेत क्यों हुआ इस विषय में कथा है जब श्री कृष्ण और राधा के पृथ्वी पर प्रकट होने का समय आया तब एक स्थान निश्चित हुआ जहां दोनों का मिलना तय हुआ। मिलन का स्थान संकेतिक था इसलिए यह संकेत कहलाया।
शुक्रवार, 30 जून 2017
युग : सतयुग और त्रेतायुग एवं भगवान विष्णु के अवतार
ॐ गं गणपतये नमः
युग : सतयुग और त्रेतायुग एवं भगवान विष्णु के अवतार
जय श्रीकृष्ण मित्रों ! सतयुग, द्वापरयुग, कलयुग हर युग में कोई न कोई भगवान जन्म जरूर लेते है। आज आप को युगों से अवगत कराते है। युग चार प्रकार के है :
पहला युग सतयुग
सतयुग में भगवान विष्णु के पहले चार अवतार क्रमशः मत्स्य, कच्छप, वाराह और नृसिंह थे। जैसे हर शरीर का अंत होता है ठीक वैसे ही एक समय का अंत भी आता ही है। ऐसा माना जाता है कि सतयुग सबसे लम्बा 1,728,000 साल का होता है, जिसमे एक सामान्य व्यक्ति 1 लाख साल तक जी सकता है जिनका कद 32 फुट लम्बा हुआ करता था।इस युग में इंसान अपनी इच्छा अनुसार मर सकता था।
सब लोग सिर्फ अच्छे कामो में रत रहते थे।
नृत्य की उस समय कोई जगह नहीं थी क्योंकि सब लोग प्रसन्न रहते थे. न कोई बीमार पड़ता था और ना ही कोई गरीब, अमीर था सब सामान थे और सिर्फ भगवान की भक्ति में लगे रहते थे.
इस युग में भगवान ने चार अवतार लिए थे, जिनके नाम थे वराह, नरसिम्हा कुर्मा और मत्स्य, सतयुग में सिर्फ एक ही धर्म था जो मनु शास्त्र के रूप में सब लोग निर्वहन करते थे. सबके के पास पहले से वृहद ज्ञान और शक्तिया होती थी।
नृत्य की उस समय कोई जगह नहीं थी क्योंकि सब लोग प्रसन्न रहते थे. न कोई बीमार पड़ता था और ना ही कोई गरीब, अमीर था सब सामान थे और सिर्फ भगवान की भक्ति में लगे रहते थे.
इस युग में भगवान ने चार अवतार लिए थे, जिनके नाम थे वराह, नरसिम्हा कुर्मा और मत्स्य, सतयुग में सिर्फ एक ही धर्म था जो मनु शास्त्र के रूप में सब लोग निर्वहन करते थे. सबके के पास पहले से वृहद ज्ञान और शक्तिया होती थी।
दूसरा युग त्रेतायुग
त्रेतायुग दूसरा युग था जिसमें अधर्म का नाश करने के लिए भगवान विष्णु तीन अवतार लिए थे, जो क्रमशः वामन अवतार, परशुराम अवतार और श्रीराम अवतार के नाम से हमारे हिंदू धर्म ग्रंथों में उल्लेखित हैं।
भगवान वामन श्री हरि के पहले ऐसे अवतार थे जो मानव रूप और पांचवें अवतार के रूप में अवतार लिया गया था। उनके पिता वामन ऋषि और माता अदिति थीं। वह बौने ब्राह्मण के रूप में जन्मे थे। वामन भगवान को दक्षिण भारत में उपेन्द्र के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि वह इंद्र के छोटे भाई थे।
भागवत पुराण के अनुसार भगवान विष्णु ने इंद्र का देवलोक में पुनः अधिकार स्थापित करने के लिए यह अवतार लिया। दरअसल देवलोक पर असुर राजा बली ने विजयश्री हासिल कर इसे अपने अधिकार में ले लिया था। राजा बली विरोचन के पुत्र और प्रह्लाद के पौत्र थे।
उन्होने अपने तप और पराक्रम के बल पर देवलोक पर विजयश्री हासिल की थी। राजा बलि महादानी राजा थे, उनके दर से कोई खाली हाथ नहीं लौटता था। यह बात जब वामन भगवान को पता चली तो वह एक बौने ब्राह्मण के वेष में बली के पास गये और उनसे अपने रहने के लिए तीन पग के बराबर भूमि देने का आग्रह किया। उनके हाथ में एक लकड़ी का छाता था। गुरु शुक्राचार्य के चेताने के बावजूद बली ने वामन को वचन दे डाला। इस तरह भगवान ने दो पग में धरती, आकाश नाम लिया, चौथा पग उन्होंने राजा बलि के सिर पर रखा था। जिसके बाद से राजा बलि को मोक्ष प्राप्त हुआ।
परशुराम अवतार: भगवान विष्ण के छठवें अवतार के रूप में राजा प्रसेनजित की पुत्री रेणुका और भृगुवंशीय जमदग्नि के पुत्र के रूप में जन्में थे। इस अवतार में वह भगवान शिव के परम भक्त थे। इन्हें शिव से विशेष परशु(फरसा) प्राप्त हुआ था। इनका नाम तो राम था, किन्तु शंकर द्वारा प्रदत्त अमोघ परशु को सदैव धारण किये रहने के कारण ये परशुराम कहलाते थे।
त्रेतायुग में भगवान राम ने रावण का वध करने लिए जन्म लिया था, क्योंकि जब-जब इस धरती पर पाप बढ़ा है तब -तब भगवान ने इस धरती को अपना विराट रूप दिखाया है। हिन्दू धर्म में श्रीराम, श्रीविष्णु के 10 अवतारों में, सातवें अवतार हैं। श्रीराम द्वारा सरयु में समाधि लेने से पहले माता सीता धरती माता में समा गईं थी और इसके बाद ही उन्होंने पवित्र नदी सरयु में समाधि ली। चारों युग में हनुमान जी एक मात्र ऐसे भगवान हैं जो अमर है द्वापर युग में भी हनुमान जी ने भीम को चारों युग के बारे बताया था, किस युग में क्या होता ये भी बताया था। आप पता है मित्रों ! त्रेतायुग 4 ,32 ,000 वर्षों का होता है, जिसमे एक सामान्य इंसान 10 ,000 साल तक जी सकता था।
गुरुवार, 29 जून 2017
पुराणों में भगवन्नाम -महिमा
ॐ गं गणपतये नमः
जय श्रीकृष्ण मित्रों ! आप ने १८ पुराणों के बारे में पढ़ा। आज आप को पुराणों के माध्यम से भगवान नाम की महिमा के विषय में बताऊगा। पुराणों में महत्व पूर्ण क्या है। ये मेरी छोटी से कोशिश आप के सामने है। चलिए मित्रो आज भगवन्नाम-महिमा का महत्व समझते है।
पुराणों में भगवन्नाम -महिमा
नारायणो नाम नरो नराणां प्रसिद्धचौरः कथितः पृथिव्याम्।
अनेकजन्मार्जितपापसंचयं हरत्यशेषं श्रुतमात्र एव।।
'इस पृथ्वी पर 'नारायण' नामक एक नर (व्यक्ति) प्रसिद्ध चोर बताया गया है, जिसका नाम और यश कानों में प्रवेश करते ही मनुष्यों की अनेक जन्मों की कमाई हुई समस्त पाप राशि को हर लेता है।'
(वामन पुराण)
न नामसदृशं ज्ञानं न नामसदृशं व्रतम्।
न नामसदृशं ध्यानं न नामसदृशं फलम्।।
न नामसदृशस्त्यागो न नामसदृशः शमः।
न नामसदृशं पुण्यं न नामसदृशी गतिः।।
नामैव परमा मुक्तिर्नामैव परमा गतिः।
नामैव परमा शान्तिर्नामैव परमा स्थितिः।।
नामैव परमा भक्तिर्नामैव परमा मतिः।
नामैव परमा प्रीतिर्नामैव परमा स्मृतिः।।
'नाम के समान न ज्ञान है, न व्रत है, न ध्यान है, न फल है, न दान है, न शम है, न पुण्य है और न कोई आश्रय है। नाम ही परम मुक्ति है, नाम ही परम गति है, नाम ही परम शांति है, नाम ही परम निष्ठा है, नाम ही परम भक्ति है, नाम ही परम बुद्धि है, नाम ही परम प्रीति है, नाम ही परम स्मृति है।'
(आदि पुराण)
नामप्रमियों का संग, प्रतिदिन नाम-जप का कुछ नियम, भोगों के प्रति वैराग्य की भावना और संतो के जीवन-चरित्र का अध्ययन – ये नाम-साधना मे बड़े सहायक होते हैं। इन चारों की सहायता से नाम-साधना में बड़े सहायक होते हैं। इन चारों की सहायता से नाम साधना में सभी को लगना चाहिए। भगवन्नाम से लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त हो सकती हैं। नाम से असम्भव भी सम्भव हो सकता है और इसकी साधना में किसी के लिए कोई रूकावट नहीं है। उच्च वर्ण का हो या नीच का, पंडित हो या मूर्ख, सभी इसके अधिकारी हैं। ऊँचा वही है, बड़ा वही है जो भगवन्नामपरायण है, जिसके मुख और मन से निरन्तर विशुद्ध प्रेमपूर्वक श्री भगवन्नाम की ध्वनि निकलती है। संत तुलसीदास जी कहते हैं-
धन्य धन्य माता पिता, धन्य पुत्रवर सोइ।
तुलसी जो रामहि भजें, जैसेहु कैसेहु होइ।।
तुलसी जाके बदन ते, धोखेहु निकसत राम।
ताके पग की पगतरी, मोरे तनु को चाम।।
तुलसी भक्त श्वपच भलौ, भजै रैन दिन राम।
ऊँचो कुल केहि काम को, जहाँ न हरि को नाम।।
अति ऊँचे भूधरन पर, भजगन के अस्थान।
तुलसी अति नीचे सुखद, ऊख अन्न अरु पान।।
जिस प्रकार अग्नि में दाहकशक्ति स्वाभाविक है, उसी प्रकार भगवन्नाम में पाप को, विषय-प्रपंचमय जगत के मोह को जला डालने की शक्ति स्वाभाविक है।
भगवन्नाम-जप में भाव हो तो बहुत अच्छा परंतु हमें भाव की ओर दृष्टि नहीं डालनी है। भाव न हों, तब भी नाम-जप तो करना ही है।
नाम भगवत्स्वरूप ही है। नाम अपनी शक्ति से, अपने गुण से सारा काम कर देगा। विशेषकर कलियुग में को भगवन्नाम जैसा और कोई साधन ही नहीं है। वैसे तो मनोनिग्रह बड़ा कठिन है, चित्त की शांति के लिए प्रयास करना बड़ा ही कठिन है, पर भगवन्नाम तो इसके लिए भी सहज साधन है।
आलस्य और तर्क – ये दोनों नाम-जप में बाधक हैं।
प्राय: आलस्य के कारण ही कह बैठते हो कि नाम-जप नहीं होता।
नाम लेने का अभ्यास बना लो, आदत डालो।
'रोटी-रोटी करने से ही पेट थोड़े ही भरता है?' इस प्रकार के तर्क भ्रांति लाते हैं, पर विश्वास करो, भगवन्नाम 'रोटी' की तरह जड़ शब्द नहीं है। यह शब्द ही ब्रह्म है। 'नाम' और नामी में कोई अन्तर ही नहीं है।
'नाम लेत भव सिंधु सुखाहीं' इस पर श्रद्धा करो। इस विश्वास को दृढ़ करो। कंजूस की भाँति नाम-धन को सँभालो।
नाम के बल से बिना परिश्रम ही भवसागर से तर जाओगे और भगवान के प्रेम को भी प्राप्त कर लोगे। इसलिए निरन्तर भगवान का नाम लो, कीर्तन करो।
कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुणः।
कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसंगः परं व्रजेत्।।
'राजन् ! दोषों के भंडार – कलियुग में यही एक महान गुण है कि इस समय श्रीकृष्ण का कीर्तनमात्र करने से मनुष्य की सारी आसक्तियाँ छूट जाती हैं और वह परम पद को प्राप्त हो जाता है।'
(श्रीमद् भागवत)
यदभ्यर्च्य हरिं भक्त्या कृते क्रतुशतैरपि।
फलं प्राप्नोत्यविकलं कलौ गोविन्दकीर्तनात्।।
'भक्तिभाव से सैंकड़ों यज्ञों द्वारा भी श्रीहरि की आराधना करके मनुष्य जिस फल को पाता है, वह सारा-का-सारा कलियुग में भगवान गोविन्द का कीर्तनमात्र करके प्राप्त कर लेता है।'
(श्रीविष्णुरहस्य)
ध्यायन् कृते यजन् यज्ञैस्त्रेतायां द्वापरेऽर्चयन्।
यदाप्नोति तदाप्नोति कलौ संकीर्त्य केशवम्।।
'सत्ययुग में भगवान का ध्यान, त्रेता में यज्ञों द्वारा यजन और द्वापर में उनका पूजन करके मनुष्य जिस फल को पाता है, उसे वह कलियुग में केशव का कीर्तनमात्र करके प्राप्त कर लेता है।
(विष्णु पुराण)
संत कबीरदास जी ने कहा हैः
सुमिरन की सुधि यों करो, जैसे कामी काम।
एक पलक न बीसरै, निस दिन आठों याम।।
सुमिरन की सुधि यों करो, ज्यों सुरभी सुत माँहि।
कह कबीर चारो चरत, बिसरत कबहूँ नाँहि।।
सुमिरन की सुधि यों करो, जैसे दाम कंगाल।
कह कबीर बिसरे नहीं, पल-पल लेत सम्हाल।।
सुमिरनसों मन लाइये, जैसे नाद कुरंग।
कह कबीर बिसरे नहीं, प्रान तजै तेहि संग।।
सुमिरनसों मन लाइये, जैसे दीप पतंग।
प्रान तजै छिन एक में, जरत न मोड़े अंग।।
सुमिरनसों मन लाइये, जैसे कीट भिरंग।
कबीर बिसारे आपको, होय जाये तेहि रंग।।
सुमिरनसों मन लाइये, जैसे पानी मीन।
प्रान तजै पल बीछड़े, संत कबीर कह दीन।।
'सुमिरन इस तरह करो जैसे कामी आठ पहर में एक क्षण के लिए भी स्त्री को नहीं भूलता, जैसे गौ वन में घास चरती हुई भी बछड़े को सदा याद रखती है, जैसे कंगाल अपने पैसे का पल-पल में सम्हाल करता है, जैसे हरिण प्राण दे देता है, परंतु वीणा के स्वर को नहीं भूलना चाहता, जैसे बिना संकोच के पतंग दीपशिखा में जल मरता है, परंतु उसके रूप को भूलता नहीं, जैसे कीड़ा अपने-आपको भुलाकर भ्रमर के स्मरण में उसी के रंग का बन जाता है और जैसे मछली जल से बिछुड़ने पर प्राणत्याग कर देती है, परंतु उसे भूलती नहीं।'
स्मरण का यह स्वरूप है। इस प्रकार जिनका मन उस परमात्मा के नाम-चिन्तन में रम जाता है, वे तृप्त और पूर्णकाम हो जाते हैं।कलियुग में भगवान की प्राप्ति का सबसे सरल किंतु प्रबल साधन उनका नाम-जप ही बताया गया है।
श्रीमद्भागवत का कथन है-" यद्यपि कलियुग दोषों का भंडार है तथापि इसमें एक बहुत बडा सद्गुण यह है कि सतयुग में भगवान के ध्यान (तप) द्वारा,
त्रेतायुग में यज्ञ-अनुष्ठान के द्वारा,
द्वापरयुगमें पूजा-अर्चना से जो फल मिलता था,
कलियुग में वह पुण्यफल श्री हरिके नाम-संकीर्तन(हरे कृष्ण महामंत्र) मात्र से ही प्राप्त हो जाता है।
कृष्णयजुर्वेदीय कलिसंतरणोपनिषद् मे लिखा है कि द्वापरयुगके अंत में जब देवर्षिनारद ने ब्रह्माजीसे कलियुग में कलि के प्रभाव से मुक्त होने का उपाय पूछा, तब सृष्टिकर्ता ने कहा-
आदिपुरुष भगवान नारायण के नामोच्चारण से मनुष्य कलियुग के दोषों को नष्ट कर सकता है। नारदजीके द्वारा उस नाम-मंत्र को पूछने पर हिरण्यगर्भ ब्रह्माजीने बताया-
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
यह महामंत्र कलि के पापों का नाश करने वाला है। इससे श्रेष्ठ कोई अन्य उपाय सारे वेदों में भी देखने को नहीं आता।
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